वक्त है बेवक्त हुए सपनों में झांकने का !

आज सुबह – सुबह एक एथलीट का ट्वीट पढ़ा उसने अंतरात्मा को झकझोर दिया । हमारे विकास के क्या मायने हो सकते है, 24 घंटे बिजली, सभी को भरपेट भोजन, बिना गड्डो वाली सड़क और सभी को उत्तम शिक्षा , लेकिन किस शर्त पर । क्या जंगलो को काट काट कर उद्यमों को लगाने पर या अपार्टमेंट बनाने के चक्कर में चावल या गेंहू के खेतों की बलि देकर ।
ये सवाल यहीं खत्म नही होता है क्योंकि हमारी मानसिकता को बदलना बहुत जरूरी हैं जो ये मानने को तैयार ही नही है कि हम लोग कितना विनाश कर चुके हैं हमारे आसपास के वातावरण का।


बैंगलोर का ही उदाहरण लीजिए जो कभी गार्डन सिटी तो कभी फैन फ्री सिटी के रूप में विख्यात थी लेकिन अब सिल्क बोर्ड और इको स्पेस के ट्रैफिक से उबर ही नही पा रही हैं , क्या एक और फ्लाई ओवर बना देना ही समस्या का हल हैं । इस शहर में IISc और अन्य कही संस्थान है जो समय समय पर चिंताएं जता चुके हैं कि अगले कुछ समय मे यह शहर रहने योग्य नही रहेगा । अप्रैल की शुरुआत ही यह बताती हैं कि आप बैंगलोर नही थार मरुस्थल में हैं ।


हर शहर के नीति निर्माताओं का यह कर्तव्य हैं कि वो अपने शहर की विरासत को बचाये लेकिन किस शर्त पर , अब हम शहरवासियों का भी समय आ गया है कि इस शहर को बचा ले। यह शहर ही नही भारत के कही शहर भी यही चिल्ला रहे हैं कि वक्त आ गया हैं बेवक्त हुए सपनों में झांकने का । इस देश की विडम्बना ये है कि ऐसे लेख या विचार व्यक्त किए जा रहे है वो भी AC रूम में बैठकर ।


अब भी समय हैं कि कुछ अगली पीढ़ी को विरासत में देकर जाए वरना उनके पास फेसबुक तो होगा लेकिन बुक के लिए कागज़ नही, जोमैटो तो होगा लेकिन रेस्टोरेंट में पकाने के लिए चावल नहीं, ट्विटर तो होगा लेकिन ट्वीट पता नही होगा, पेपर बोट तो होगा लेकिन उसके लिए आम नही होगा ।

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