​एक आईटी इंजीनियर की मनोव्यथा

 

इसकी शुरुआत तब होती जब वो अपनी इंजिनीरिंग के फाइनल ईयर में होता है, जैसे तैसे वो जुगाड़, रेफेरेंस , कंसल्टेंसी कैसे भी कर के फील्ड में उतर आता है । कभी वो स्टार्टअप के शोषण को सहन करता है तो कभी वो mnc के बेंच पर बैठे बैठे अपनी घिसाता रहता हैं ।

   

धीरे-धीरे उसे हकीकत का एहसास होता है कि जैसे वो सपने देख रहा था वैसा तो कुछ भी नही है, भले ही वो जावा सर्टिफिकेशन करके आया हो लेकिन काम वो मेनफ्रेम मेन्टेन्स का कर रहा होता हैं। हर बंदा यही सोचता है कि कुछ तो वो दुनिया बदल देने वाला डेवलपमेंट करेगा, उसकी आँखों में ज़ुकेरबर्ग, एलन मस्क, बेज़ोस या बिल गेट्स के जैसे सपने होते है लेकिन असल मे कोई एक आधा बग फिक्स कर रहा होता हैं ।

    
अगर मानलो वो किसी स्टार्टअप में काम कर रहा होता है तो घरवालों, रिश्तेदारों और दोस्तो को अपनी कंपनी और उसके प्रोडक्ट या सर्विस समझाने में ही सदियाँ बीत जाती है और अंत में थक हार कर यही मानना पड़ता हैं कि नोएडा या बैंगलोर में टाइम पास कर रहा है । इसमें ग़लती दोस्तो/घरवालों/रिस्तेदारों की भी ज्यादा नही होती हैं , ज्यादा जिम्मेदार तो स्टार्टअप फाउंडर्स ही होते हैं , आप ही देख लो कुछ स्टार्टअप के नाम जोमैटो, ज़ोलो, क्याजोंगा, ज़ोहो, ओला, ऊबर ऐसा लगता है जैसे कोई एलियन से बात कर रहे हैं । अब कोई कैसे इन नामों को जस्टिफाई करे कि ये आईटी कंपनी के नाम हैं न कि चाइनीज फ़ूड ।

   
अगर MNC में हो तो फिर कहना ही क्या, ठीक जैसे आपके रिश्तेदार आपका पीछा नही छोड़ते है वैसे ही ये भी हमेशा आपके साथ रहते हैं, जब तक कि आप इनके साथ है। पहले इनका कभी न खत्म होने वाला इंडक्शन प्रोग्राम/ ट्रेनिंग , अब इनको कौन समझाए केरला जाके कौन ट्रेनिंग करता है बे । ले जाते है आसपास ही अच्छी जगह और फिर शुरू होता है दोस्तो पर अत्याचार, फेसबुक, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम और इनका बस चले तो शादी डॉट कॉम पर भी डाल दे पर अपनी सैलरी देख के पीछे हट जाते हैं । फिर कुछ डायरीज चालू होती हैं जैसे कि बैंगलोर डायरी, पुणे डायरीज , मैसूर डायरीज.. इतनी तो गैस एजेंसी वाले के पास भी नही होती है जितनी इनकी fb या इंस्टा वाल पर हो जाती हैं ।

    
फिर शुरू होता है प्रोजेक्ट अलॉटमेंट , ठीक वैसे ही जैसे हम बचपन मे अकड़म -बकड़म खेल खेला करते थे , ट्रेनिंग किसी और में तो लोकेशन प्रेफरेंस कुछ और बाद में कुछ लोगो को मिलता है प्रोजेक्ट और बाकी आ जाते है बेंच पर। बेंच और शादी के मंडप में बैठे दूल्हे दोनों की हालत बिल्कुल समान होती हैं , खुद को पता होता है वो क्या कर रहा है लेकिन फ्लो में बहना उसकी मजबूरी है ।

   
बेंच पर होने के बहुत फायदे होते है क्योंकि वहाँ बैठ कर CAT की तैयारी हो सकती है तो GATE की जुगत में भी लगा जा सकता हैं और ऐसे दोस्त भी मिल जाते है वो अपने कॉलेज की बिल्कुल याद नही आने देते । कंपनी की सभी सुविधाओं के बारे में सब पता होता है, जिम कोनसे ब्लॉक के कोनसे फ्लोर में है वो रटा हुआ रहता है। कैफेटेरिया के मेनू से लेकर काफी वेंडिंग मशीन सब अपने से लगते हैं । बिना सोशल साइट्स के लोग कैसे रहते है आफिस में ये इनसे जाकर पूछें तो पता चलेगा ज़ुकेरबर्ग ने कितना पूण्य का काम किया । टीटी टेबल हो या स्नूकर टेबल इनसे कोई नही बच सकता हैं ।  ट्रेवल डेस्क हो या स्ट्रेस मैनेजमेंट क्लास , सब इनको पता होता है । और जो कल्चरल डे के नाम पर रंगोली प्रतियोगिता होती है उसमें भी इनकी उपस्थिति शत प्रतिशत होती है ।

   
HR का ईमेल तो इन्हें ऐसे लगता है जैसे किसी ने परमाणु बम फोड़ दिया हो इनकी खुशहाल ज़िंदगी में, नए नवेले जोड़े भी बन जाते है जो कभी कॉलेज लाइफ में छूटे से लगते थे ।

क्रमशः

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