​पेट्रोल – मेरी कहानी, मेरी जुबानी

मेरा नाम सुन कर ही लोगों के मन मे आग लग जाती है , वैसे मेरा जन्म कहाँ हुआ वो तो मुझे सही सही पता नही और मैने बता दिया तो जेएनयू वाले क्या करेंगे उन्हें भी तो चालीस बरस लगते ही है उनके रिसर्च के लिये । उन्हें वैसे भी ऐसे ही मुद्दे चाहिए अपनी पीएचडी के लिए कि पेट्रोल का जन्म कहा हुआ हैं । शायद भारत मे तो नही हुआ क्योंकि किसी भी नेता ने अब तक मेरा रिश्ता नही जोड़ा है खुद से । अगर हुआ होता तो कभी में गुजरात, तो कभी मप्र,  तो कभी मुंबई, तो कभी बिहार में बंट जाता । कभी धर्म निरपेक्ष होता तो कभी हिन्दू या मुस्लिम हो जाता । कभी मुम्बई में ही इस्तेमाल होने का हुक्म आ जाता तो कभी बंगाल से बाहर निकाल दिया जाता । कभी मातोश्री, पोअस गार्डन , लोक कल्याण मार्ग में घूमता फिरता ।

 

वैसे मेरा इस्तेमाल एक और रूप में होता है जिसे लोग पेट्रोल बम्ब कहते है , उससे ज्यादा धर्म निरपेक्ष कोई  ओर नही होता है जो कभी यह नही देखता कि उसका इस्तेमाल किसने और कहां किया चाहे वो तेहरान हो, बगदाद हो, काबुल हो या पेशावर या फिर नई दिल्ली या कश्मीर । चाहे वो जिहादी के हाथ से चले या धर्म रक्षक के हाथ से हमेशा ही शत प्रतिशत रिजल्ट देता है । वो कभी भी फर्क नही करता है गाड़ियों के जलाने में, वो ऑडी हो या ऑटो, डीटीसी हो या मेट्रो सबको बराबर तीव्रता से जलाता है ।  मेरा कभी इस्तेमाल कश्मीर के युवां करते है तो कभी सीरिया के कुर्दिश लड़ाके, सब के अपने अपने नाम और अपनी अपनी ढपली । लेकिन ख़ुदा क़सम मैने कभी भी किसी मे भेदभाव नही किया ।

मेरा विकास में भी बड़ा योगदान है , विश्वास नही होता तो दुबई, आबू धाबी, दोहा, शारजहां, तेहरान औऱ एंटीलिया । अगर मैं नही होता तो आप बिज़निस ट्रिप के नाम पर दुबई में डेज़र्ट सफारी का आनन्द नही ले पाते । वैसे थार के रेत और अरब के रेत में ज्यादा अन्तर नही हैं, केवल मेरा होना या न होना ही सब कुछ बदल देता है । अगर मैं नही होता तो अमेरिका को ईराक और अफगानिस्तान से मिसाइलों के गलत इस्तेमाल से रोकने के लिए युद्ध नही करने पड़ते औऱ न ही आईएसआईएस बनता ।

भले ही नेता किसी भी देश या विदेश के हो मेरे जितने गरीब के दोस्त नही हो सकते , मैं जब गरीब की गाड़ियों में इस्तेमाल होता हूं तो 60 kmph का माइलेज देता हूं विश्वास नही हो रहा है अरे यार वो अपनी मिलों का याराना वाली गाड़ी देती तो है इतना लेकिन जब मैं अमीर के वहाँ होता हूं जलवे तो होते है लेकिन माईलेज 10 kmph का ही रह जाता है।

और सबसे ज्यादा जनता का चूतिया मेरी कीमतों से काटा जाता है इतना तो केजरीवाल बयान नही बदलता जितनी कीमते बदलती है । जब सब कुछ सही चल रहा होता है तब मेरी कीमतों में बदलाव, जब सही नही चल रहा है तब भी मेरी कीमतों में बदलाव ।

मेरे लिये लोगो का उपयोग देख कर मै भी खुद अचंभित हो जाता हूँ, क्योंकि मेरे लिए कभी हड़ताल होती हैं तो कभी मेरा ही उपयोग कर उसी हड़ताल में दुकानें जलती है तो कभी बहु बेटियां । कभी भी क़ीमत ऊपर-नीचे होते ही ऐसे दौड़ पड़ते हैं जैसे मेरी आख़री बून्द बची है इस धरती पर, इतना तो लोग पोलियो की दो बूंद पिलाने नही गए होंगे आज तक, हां अगर ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन भी दूर नही जब मै भी गायब हो जाऊंगा जैसे गधे के सिर से सिंग गायब हुए थे ।

मेरा सफर भी बहुत ही रोमांचित कर देने वाला है, वो अपने परिवार के साथ धरती की गोद मे सुकून से रहता हूँ फिर एक बोरवेल होता है जो मुझे अपने परिवार से अलग करता है ठीक वैसे ही जैसे यूपी का एक नोजवान मुम्बई आता है रोजगार के लिये । फिर पहुंचता हूँ रिफाइनरी जहां मुझे अपने भाइयों से अलग किया जाता है और अहसास दिलाया जाता हैं कि मैं महत्वपूर्ण हूँ जैसे कि चुनावों के पहले जनता को दिलाया जाता हैं ।

 

यहां से शुरू होता हैं कीमतों का खेल, अपने हिसाब से लोग टूट पड़ते हैं क़ीमत लगाने के लिए, इतने लोग तो जिओ की सिम के लिए भी नही लगें थे फ्री का हिसाब लगाने में । इस तरह फिर पहुंचता हूँ पेट्रोल पंप, ये ऐसी जगह है जिसे पंतजलि वाले भी शुद्ध नही कर सकते, अगर 1 लीटर में 900 ml पेट्रोल नही गया तो पंप मालिक अपनी इज्जत पर हमला मानते हैं । इतने घोटाले तो शायद यूपीए सरकार भी नही कर पायी उतने तो ये लोग रोज़ करते हैं । अगर इन सब से भी बच गया तो शरू होता हैं मिलावट का खेल औऱ यू कहे तो रिफाइनरी से ज्यादा शुद्ध तो यहां किया जाता है, भले ही पंजाब में ड्रग्स मिले या न मिले, कश्मीर के भटके हुए युवा एक बार पत्थर फेंकना छोड़ सकते हैं, यूपी में गुंडा गर्दी खत्म हो जाये, यहां तक कि हरियाणा का जाट अपनी बोलेरो पर नंबर लिखा सकता है लेकिन मेरे अंदर मिलावट न करना मुश्किल ही नही नामुमकिन है ।

 

अभी 5 लीटर के नाम पर भले ही 4 लीटर ही भर देते हैं लेकिन मिलों का याराना हमेशा चलता रहता है, ये ऑटो कंपनियों में होड़ मची है कि कौन ज्यादा झूठ बोल सकता है । भले ही गाड़ी 50 km चले लेकिन रुतबे इन के बिल्कुल राहुल गांधी जैसे ही है जो 25 चुनाव हार कर भी अभी तक हार के कारणों का विश्लेषण ही कर रहे हैं । गाड़ी चले या न चले सारा दोष मेरे पर डाल दिया जाता हैं ठीक वैसे ही जैसे मनमोहन सिंह की हालत अभी कांग्रेस में है । मेरी यात्रा यहीं खत्म नहीं होती , फिर शुरू होता है इंजिन के कारनामे , कभी bs-lll तो कभी bs-lV , पता नही कितने लेवल होते है इतने तो बीजेपी के विधायक नही है दिल्ली में।

मेरी यात्रा के अंत मे शरू होता है दोषारोपण, ग्लोबल वार्मिंग का, क्लाइमेट चेंज का, अकाल का, अतिवृष्टि का, सब लोग मेरे ही ऊपर अंगुली उठाते हैं , हिंदी हो या अंग्रेजी अखबार बड़े-बड़े कॉलम लिखे जाते हैं, फोरम बनते है, कॉन्फ्रेंस होती है लेकिन मेरी कोई नही सुनता । मेने कब तुमसे कहा कि खेत उजाड़ कर एक्सप्रेस वे बनाओ, समुद्र को कचरा पात्र बनाओ, गाँवो को उजाड़ कर फैक्टरी लगाओ, जंगल काट कर IT पार्क बनाओ । कोई भी पेड़ लगाना नही चाहता, पैदल चलना नही चाहता बस सब ज्ञान बाटने में लगे है । मेरा क्या, मेरा तो स्वभाव है उड़ना, कभी धुंए के रूप में तो कभी किसी के सपने उजाड़ने में, तुम्हें ही दिक्कतें होगी पीछे संभालने में।

 

मेरी भी इच्छा या अंतिम ही समझ लो कि कोई ‘पढ़ा-लिखा‘ गीतकार मेरे ऊपर भी कोई गाना लिखे जिससे  कम से कम पान के गल्लों पर मेरा गाना बजे और बुद्धिजीवी मुझे समझ तो सके ।

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