एक आईटी इंजीनियर की मनोव्यथा  – पार्ट 2

 

अभी बेंच पर ही ‘हनीमून’ चल ही रहा होता है कि अब धीरे धीरे घबराहट होने लगती हैं क्यों CAT और GATE में कुछ उखड़ा नही और IAS के लिए जाने के लिए अभी साहस नही होता हैं।

घर वालों और रिश्तेदारों के दबाव में ibps के भी दो अटेम्प्ट दे चुका होता है , रही सही कसर गर्लफ्रैंड भी डिच करके किसी स्मार्ट बंदे के साथ चली जाती है, इस समय बंदे की हालत बिना कोहली के rcb वाली हो जाती है ।

    
फिर शुरू होता है प्रोजेक्ट के लिए जुगाड़ करना, इस कला में वैसे भी पारंगत हो जाता है , एक बार इंजीनियरिंग करने के बाद । वैसे भी भारत में इंजीनियरिंग के बाद ही असल पता चलता है कि उसे असल मे ज़िंदगी मे क्या करना है । प्रोजेक्ट के लिए दौड़भाग शुरू होती है तो ऐसे ऐसे काम करने पड़ते है जो वो कभी सोचता भी नही है । ऑपरेटिंग सिस्टम के एडवांस कॉन्सेप्ट  पढ़ कर जो पीपीटी बनाने में मज़ा आता है , उसकी बाकी लोग कल्पना भी नही कर सकते । एक दो टीम आउटिंग और कुछ एक्सेल और पीपीटी के बाद प्रोजेक्ट भी फाइनली मिल जाता है और लगता है कि हा अब हम भी बन गए  IT इंजीनियर।

    
लेकिन असल कहानी तो प्रोजेक्ट असाइन होने के बाद शुरू होती है, शुरू के कुछ महीने तो डॉक्यूमेंटेशन पढ़ने और उन्हें सुधारने में ही चला जाता है। वो इतना इंग्लिश लिख औऱ समझ लेता है कि अपने आप को चेतन भगत समझना शुरू कर देता है । सबसे गज़ब बात डॉक्यूमेंट की यह है कि आप कितना भी अपडेट कर दो , न तो क्लाइंट उसे पड़ता है और न ही प्रोजेक्ट मेंबर ।

   

अब टाइम शीट भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि अब आपको प्रोजेक्ट जो मिल गया है , भले ही आप स्कूप-व्हूप पढ़ कर दिन निकाल रहे हो लेकिन टाइम क्लॉकिंग कम से कम 9 घंटे होनी ही चाहिए। अगर एक घंटा भी कम हुआ तो आपका वो दिन हाफ डे में कन्वर्ट हो ने में बिल्कुल देर नही होती, भले ही क्लाइंट विजिट के नाम पर पोस्टर, पीपीटी, एक्सेल शीट बनाने के चक्कर में रात भर बिठा के रख सकते हैं। डिस्कशन में तो इतनी अदभुत पकड़ हो जाती हैं कि पीपीटी के फॉन्ट के लिए दो – तीन दिन तो ऐसे ही आराम से डिसकस कर सकते हैं।

    
प्रोजेक्ट में भी जब पीपीटी और एक्सेल  बनाते बनाते एक और एटेम्पट तो CAT और GATE का हो ही जाता है, जब कुछ भी नही होता है तो बंदे की जान गले मे अटक जाती है और वो अपनी इंजीनियरिंग का एक एक दिन याद करना शुरू कर देता है  जब भी उसने पढ़ाई की ।  इतना तो राहुल गांधी भी चुनाव हार कर परेशान नही होता जितना ये हो जाते है। लेकिन जब भी पीपीटी के लिए शाबाशी मिलती है तो लगता है कि बस अब जीवन सफल हो गया है , अब कुछ करने की जरूरत नही लगती।

   
इसी बीच उसे लगने लगता हैं कि जो सैलरी उसको मिल रही है उससे उसका कुछ होने वाला है नही तो फिर आता है क्रेडिट कार्ड। भले ही आज समाज मे क्रेडिट कार्ड स्टेटस सिंबल नही रह हो लेकिन इन लोगो की यह लाइफ लाइन बसन जाता हैं। धीरे धीरे क्रेडिट कार्ड के मोह में ऐसे फसता हैं कि सैलेरी तो बिल भरने में ही पूरी हो जाती । क्या महीने का अंत और क्या शुरुआत, बस क्रेडिट कार्ड ही आखिरी रास्ता बचता है , सर्वाइवल के लिए ।

   
अब धीरे धीरे उसे भी प्रोजेक्ट में कुछ काम करने को मिलने लगता है, ठीक वैसे ही जैसे मोदी सरकार रोजगार दे रही है। जब उसे पता चलता कि उसके प्रोजेक्ट में 500 लोग काम कर रहे है और उनमें भी किसी एक मॉड्यूल की एक स्क्रीन के फॉर्म के सेलेक्ट बॉक्स में एक ऑप्शन जोड़ने का काम मिला तो दिल पत्थर का हो जाता हैं लेकिन पूरी तन्मयता के साथ उस चेंज रिक्वेस्ट के लिए स्टार्ट होती है किक ऑफ मीटिंग । मीटिंग वो चीज़ होती है जिसमे 90% समय सिर्फ और सिर्फ इधर उधर की बातें होती है, जब 10 मीटिंग, 15 एक्सेल शीट और 20 पीपीटी के बाद सेलेक्ट बॉक्स चेंज करने का अप्रूवल मिल जाता है तब कोडिंग स्टार्ट होती है । इतनी एफिशिएंसी के साथ तो भारतीय संसद तक काम नही करती जितना ये समय लगा देते है, किसी भी प्रोपोजल को यस बोलने में।

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क्रमशः

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