​WhatsApp – मेरी कहानी, मेरी जुबानी !

​WhatsApp – मेरी कहानी, मेरी जुबानी !

सन 2009 का दौर था जब सोशल मीडिया के नाम पर फेसबुक, ऑरकुट और ट्वीटर ही थे। ऑरकुट जहाँ नोकिया की तरह इंटरनेट पर धूम मचा रहा था तो फेसबुक सैमसंग की तरह अपने पैर पसार रहा था और ट्वीटर आईफोन की तरह सिर्फ चुनिंदा लोगो तक ही सीमित था, तभी सुदूर पश्चिम में दो बेरोजगार नौजवान जिन्हें गूगल और माइक्रोसॉफ्ट तक नौकरी देने के लिए तैयार नही थे, ने मिलकर कुछ आसान सा बनाने का विचार कर रहे थे ।

ऑरकुट जहाँ उस समय उसके सितारे बुलंद थे, बच्चों खासकर कॉलेज और स्कूल में बहुत लोकप्रिय था और ऑरकुट पर आईडी न होना, अपने आप मे एक बहुत ही घिनौना काम था और तब तक हच भी वोडाफोन नही बना था। वो रंग बिरंगी वाल, दोस्तों को इनवाइट करना, उनके साथ इंटरनेट पर बात करना अपने आप मे ही बहुत बड़ी फीलिंग होती थी। जहां गाँव के बच्चें 2007 वर्ल्डकप में मिली हार को नही पचा पा रहे थे और दिन रात क्रिकेट खेलने में बिजी थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके एक एक शॉट की प्रैक्टिस 2011 वर्ल्डकप के लिए भारत को जिताने के लिए जरूरी है। वही शहर के बच्चे अभी भी जॉन सीना और अंडर टेकर की फाइट में बिजी थे और टाइम मिल गया तो थोड़ा बहुत वीडियो गेम भी हो जाता था लेकिन ऑरकुट कभी भी प्राथमिकता में नही था, एक हफ्ते में एक पोस्ट भी बड़ी शान मानी जाती थी।

फिर जब कॉमनवेल्थ और 2G/3G घोटाले हो गए तो आम आदमी को पता चला कि फोन पर भी इंटरनेट चल सकता हैं, इसके लिए कांग्रेस अगर नोबेल भी मांगे तो उन्हें दे देना चाहिए क्योंकि जो उपकार/घोटाले उन्होंने देश पर किये वो तो काबिलेतारीफ है। जिस समय पर एक ईमेल आईडी होना भी स्टेटस सिंबल माना जाता था , उसे बिल्कुल सामान्य बना दिया।

इसी दौर में नया नामकरण भी शुरू हुआ , पहले जन्म होने पर कुंडली बनाने के बाद एक समारोह में नामकरण किया जाता था और बड़े बुजुर्गों के अनुसार ही कोई राम, श्याम , रमेश, सुरेश या दिनेश जैसा कोई नाम रख लिया जाता था लेकिन अब ये दौर FB और व्हाट्सअप का था, कब रामू स्मार्ट रामस बन गया पता ही नाही चलता, एंजेल प्रिया, एंजेल पूजा , ऐसा लगने लगा कि सुश्री की जगह अब एंजेल भी फॉर्म में आने लग जायेगा। दादाजी एंजेल प्रिया को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज रहे थे और दूसरे कमरे में बैठा उन्ही का पोता इस रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर रहा था।

जब ये फेक आईडी और टाइम पास ज्यादा होने लग गया तो व्हाट्सएप ने आकर सभी इंटरनेट के सताए हुए लोगो राहत दे दी, भले ही एंजेल प्रिया ने अपनी डीपी पर अभी भी प्रियंका चोपड़ा की ही पिक लगा रखी हो। व्हाट्सएप में एक और गजब की बात ये थी कि इसमें आपको इंटरनेट के झमेले में नही पड़ना था, अगर आप के पास फोन नंबर है तो वो आप के लिए खूब है । अगर व्हाट्सएप इंडिया में बना होता तो शायद आधार कार्ड से भी लिंक हो जाता, आधार कार्ड ने हो गया मंदिर की घण्टी हो गयी, जिसे जब मर्ज़ी हो बजा लिया ।

पार्ट -2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे !

पेट्रोल की कहानी पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करे !

4 thoughts on “​WhatsApp – मेरी कहानी, मेरी जुबानी !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: