अफीम – मेरी कहानी, मेरी जुबानी ! पार्ट – 2

जो लोग इस विशेष पेय पदार्थ को पीते हैं उन्हें ‘अमलदार‘ कहा जाता है, पहले के समय ये पद बड़ा ही सम्मानित था, समाज के बड़े बुजुर्ग इसका उपयोग करते थे, ये लोग समाज के पंच या विशेष लोग होते थे जिनकी पूरे समाज या समुदाय पर विशेष प्रभाव होता था, उन्हें एक सम्मानित दर्जा दिया जाता था लेकिन इस आर्थिक युग मे अमलदार शब्द की परिभाषा ही बदल दी, जिस प्रकार कुरान और गीता के नाम पर समाज और धर्म के ठेकेदारों ने अपनी अपनी धर्म और संगठन की परिभाषाए बना ली, ठीक वैसे ही इस सम्मानित पद का भी पतन हो गया और ये आगे चलकर नशावृत्ति का नया स्वरूप बन गयी ।

 

अब तो 20 -25 साल के युवा भी धड़ल्ले से इसका उपयोग कर रहे , जो मर्यादा व सम्मान इससे जुड़ा है वो तो कब का गायब हो चुका हैं। अब क्या दादा, क्या पोता, क्या काका, क्या भतीजा सब मिल कर कलयुग के इस अमृत का पान कर रहे है। डॉक्टर आपरेशन से पहले आदमी को सुन्न करने में करते है , मेरे ज्यादा डोज  से आदमी सुन्न हो जाता है ,ठीक वैसी ही हालात इन लोगो की भी हो जाती है, ये न आर्थिक बल्कि शारीरिक रूप से भी आदमी निष्क्रिय हो जाता है।  राम – लक्ष्मण की जोड़ी की तरह मेरे भी एक जोड़ीदार है उसका नाम है चाय। भले ही एंजेल प्रिया एक बार के लिए गोल गप्पे के बाद एक्स्ट्रा पपड़ी मांगना  छोड़ सकती है लेकिन अफीम के साथ चाय का न होना तो लगभग नामुमकिन है। चाय पर भी किसी दिन चर्चा करेंगे क्योंकि इस पर चर्चा से लोग प्रधानमंत्री बन जाते हैं।
इस विशेष पेय पदार्थ की महिमा का गुणगान जितना करे उतना कम है क्योंकि ये ही पीढ़ी दर पीढ़ी कर्ज को बढ़ाता है, चाहे सरकार मनरेगा के नाम पर कितनी ही रेवड़ियां बांटे लेकिन जब मेरे से तुलना हो तो जितना आम आदमी एक दिन में कमाता है उससे तो सिर्फ 5 ग्राम का मोल होता है, जी हा सही पढ़ रहे हो आप सिर्फ 5 ग्राम खरीद सकता है एक गावँ का किसान जो दिन के 100 रुपये कमाता हो । उन 100 रुपये के पीछे की कहानी आपको पता है ।
जब परिवार में से इस विशेष पेय पदार्थ पीने की लत लग जाती है तो फिर उस परिवार का सर्वनाश सुनिश्चित हो जाता है, उस परिवार के बच्चे आपको कही पर मेहनत मजदूरी करते हुए नजर आ जाते है और भारत मे एक विशेष समस्या भी है कि जब भी कोई चीज़ धर्म या सामाजिक प्रतिष्ठा बन जाये तो आदमी बिना सोचे समझे उस पर खर्च करना शुरू कर देता है। भले ही पाकिस्तान एक बार आंतकवाद छोड़ दे लेकिन इस पेय पदार्थ की लत छुड़ाना मुश्किल है।
ये पेय पदार्थ सामाजिक शान के साथ साथ ही मान मनुहार से भी जुड़ा होता है औऱ यही पर इस का घातक रूप सामने दिखने लगता है । ये लत प्लेग से भी भयावह और खतरनाक है क्योंकि प्लेग का तो एक बार इलाज संभव है लेकिन इसका नही है। जिस तरह  प्रदूषण बीमारियों को बढ़ाता है ठीक वैसे ही अगर समाज के बुद्धिजीवी भी इसमें लग जाये तो फिर तर्क देना भी बेनामी हो जाता है, कभी ये भोले का प्रसाद तो कभी ये बुद्धिजीवियों का सम्मान तो कभी प्रतिष्ठा का पैमाना बन जाता है। समाज के किसी भी व्यक्ति का इनके विरोध में बोलना अक्षम्य अपराध माना जाता है और उसको कुतर्कों से नीचा दिखाने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। ये उन लोगो को भी पता होता हैं कि सामने वाला सही कह रहा है लेकिन अपने अहम और लत के कारण उसको साम-दाम-दंड-भेद कैसे भी करके उसको गलत सिद्ध कर दिया जाता है। अगर इनको भारत के कूटनीतिक बना दिया जाए तो कश्मीर की समस्या तो चुटकियों में हल कर दे।
मेरा क्या है मुझे तो उपयोग में होना है चाहे वो दवाई के रूप में जो इलाज के लिए या पेय पदार्थ/चरस/डोडे के रूप में व्यक्ति के शरीर के साथ ही पूरे परिवार के विनाश में। ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ कृति का दर्जा दिया है तो उसी के स्वविवेक पर मुझे भी अपना उपयोग छोड़ देना चाहिए क्योंकि यूरेनियम जैसे रेडियोएक्टिव तत्व कैंसर के इलाज में काम आते हैं तो परमाणु बम भी उन्ही से बनता है। जब आदमी अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के चक्कर में अपना सर्वस्व त्याग करने के लिए तैयार है तो मेरा क्या होने दो इनको भी इस बाजार/तस्करी/नशावृत्ति का शिकार। जब तक सारे लोग मिलकर पहल नही करंगे तब तक मेरा कुछ भी नही बिगाड़ पाओगे इसीलिए गनीमत इसी में हैं कि मुझे दवाई का रूप ही रहने दें वरना नुक़सान तो पूरे समाज का कर सकती हूँ और वो हो भी रहा हैं।

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क्रमशः

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