अफीम – मेरी कहानी, मेरी जुबानी ! पार्ट-3

ये जलवे तो सिर्फ मेरे एक रूप के है वो भी एक सम्मानित उपयोग, जिसमे लोगो की सहमति से मेरा उपयोग नशे के रूप में किया जाता है। अब कुछ और रूप है जो ज्यादातर न्यूज़ चैनल की सुर्खियों में नजर आते है, कभी तस्करी के रूप में, तो कभी बरामदगी के रूप में। आज की युवा पीढ़ी को जीतने संसाधन मिले है वैसे शायद ही किसी और पीढ़ी को मिलेगा लेकिन उपयोग और उपभोग में कई ज्यादा अंतर होता है, ये बात  आजकल के युवां न तो सुनना चाहते हैं और न ही समझना। आजकल तो वो दौर है जब बड़े/बुजुर्गों की झुर्रिया,  गूगल के सामने कही नही टिकती।

 

हेरोइन, चरस, कोकीन और न जाने और क्या क्या, इतने नाम तो शायद भगवान कृष्ण के भी नही होंगे । कभी सिगरेट में मिला कर तो कभी हथेलियों में चाट कर तो कभी सूंघ कर , न जाने कैसे कैसे उपयोग होता है। जितना ज्यादा नशा, उतनी ही बड़ी कीमत और इतना ही नाश। अभी कुछ दिनों पहले एक बैंगलोर के छात्र ने मुंबई में एक बिल्डिंग से कूद कर जान दे दी, जब आत्महत्या की वजह पता चली तो सब के होश उड़ गए, नशे की वजह से डिप्रेशन में चला गया था और अपने जीवन को समाप्त करने में अपनी भलाई समझ ली। मां ने एक बेटे को, देश ने एक शायद होनहार इंजीनियर को खो दिया । अब भले ही वेब पोर्टल बना ले, कॉउंसलिंग की व्यवस्था कर ले लेकिन मूल समस्या ऐसे ही बनी हुई है।

 

आज भी कई प्रदेशों में यह एक गंभीर समस्या बन गयी है , चाहे वो पंजाब हो या दिल्ली हो या यूपी हो या राजस्थान सब इसके चंगुल में फसते चले जा रहे है। कब सिगरेट के छल्ले , हेरोइन की आदत में तब्दील हो गए पता ही नही चला। एक युवक की जान  कब ड्रग्स से सस्ती हो गयी, सब तल्लीन है पैसे जुटाने में  लेकिन कोई इस पर बात नही करना चाहता। अगर कोई स्नैपचैट वाला कुछ कह दे तो इनका स्वाभिमान डगमगा जाता है लेकिन ड्रग्स की वजह से होने वाले अपराधों एवं आत्महत्याओं पर किसी का ध्यान नही है। सब सरकार में बैठे हुक्मरानों के क़सीदे पढ़ने में बिजी है। आजकल कोई ‘भक्त‘ है तो कोई ‘खान्ग्रेसी‘ है तो कोई ‘आपटार्ड‘ है लेकिन इंसान किसी को नही बनना है। हाल तो यहाँ तक है कि जब तक कोई बाबा इनको ने बताए तो शहद और शक्कर में भी फर्क नहीं कर पाएंगे।

 

सब लोग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में लगे हुए है, नशामुक्ति तो कुछ NGO और रोटरी क्लब जैसी संस्थाओं के ऊपर डाल रखा है। कुछ लोग ‘उडता पंजाब‘ को सेंसर करने में अपनी बहादुरी समझ रहे है तो कुछ मेनिफेस्टो बना कर अपना काम निकालने में लगे है। असल मुद्दे पर कोई बात नहीं करना चाहता हैं। सबको अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेकनी है तो किसी को अपना प्रभाव जमाना हैं, कोई ‘अच्छे दिन‘ और ‘न्यू इण्डिया‘ में बिजी है तो कोई ‘महिला सशक्तिकरण‘ का झुनझुना लिए बैठा है तो कोई दलित और समाजवाद से ऊपर ही नही उठ पा रहा है। जब WHO और UNESCO के आँकड़े देखते है तो आंखे क्या अंदर से रूह तक कांप जाती है।

 

किस बल पर हम नया इंडिया बनायेंगे, क्या गांजे के नशे में किसी के हाथों ट्रैन की कमान दे देंगे, जो व्यक्ति नशे से ऊपर नही उठ सकता वो क्या करेंगे देश के लिए। ऐसे कही उदाहरण है आसपास, एक बार नज़र घुमा कर तो देखो। अनगिनत युवा मिल जाएंगे जो शौक की आड़ में और फ़ैशन के चक्कर में अपना सब कुछ खराब कर चुके हैं। आज मेहनत कोई नही करना चाहता है, सब को बाबा की बूटी चाहिए जिससे वो रातो रात अपने सारे सपने पूरे कर दे। स्वर्ग सबको देखना लेकिन उसके लिए मरना कोई नहीं चाहता।

 

तस्करों ने अपना ऐसा नेटवर्क तैयार कर रखा है कि अगले 10 साल में भी जिओ , 4-5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पर भी अपना नेटवर्क नही बना पायेगा। हालात यहाँ तक है कि एक युवा बैंगलोर में आकर बिना कन्नड़ सीखे, इन सब नशीली चीज़ों को पा सकता है, जहां उसे एक सिम लेने के लिए नानी याद आ जाती हैं।  सबके लेवल बने हुए हैं 500 की पुड़िया भी है तो 50000 का माल भी मिल जाएगा ।  ये सब किसकी शह और शरण मे हो रहा है वो किसी से छुपा हुआ नही है।

 

आज मेरा सवाल करने का मन नही है, आप खुद से पूछे और देखे आसपास आपके क्या हो रहा है, वर्चुअल दुनिया से निकल कर देखे कि कही कुछ खुद के करीबी के साथ ही तो गलत नही हो रहा है।

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