​एक आईटी इंजीनियर की मनोव्यथा – पार्ट 3

 

अब उसे भी किक-ऑफ मीटिंग्स के मायाजाल के बारे में धीरे धीरे समझ आने लगता है , जब initial requirement के बारे में लगभग दस से 15 मीटिंग्स हो जाती है तो यह तय होता है कि select box का color बाकी theme से match होनी चाहिये और font भी जो पुराने है वो ही use करने है। अब फाइनल requirement के बाद बन्दा कोडिंग शुरू करता है तो समझ आता है कि अब काम कैसे करे क्योंकि जो उसने ट्रेनिंग या कॉलेज में सीखा वो कुछ और हैं और प्रोजेक्ट असाइन हुआ है वो कुछ और टेक्नोलॉजी में। भले ही सचिन को ओवर पिच बॉल पर खुद के स्ट्रेट ड्राइव पर विश्वास हो या न हो लेकिन बंदे को अपने में जुगाड़ करने की जो कला होती है, उस पर पूरा भरोसा होता है ,वो उसे यहाँ बचा लेती है।

 

अगर इस दुनिया में कोई मुश्किल काम है तो वो है बनशंकरी से वाइट फील्ड का सफर करना या किसी और के कोड को समझना या उसे ठीक करना। यहाँ ये समझ नही आता हैं कि जिसने कोड लिखा है उसने कुछ काम करने के लिए लिखा है या अपनी frustration  निकालने के लिए। कोड पढ़ते समय पता चलता हैं कि इस चेंज से तो अच्छा पूरा मॉड्यूल ही खुद बना ले। एक बार के लिए तो डॉक्टर की प्रेस्क्रिप्शन स्लिप भी आसान लगने लग जाती है किसी और के कोड के सामने। 10 function, 50 if-else condition, database connection और modal, view, controller, tables देखने के बाद उसे समझ आता हैं कि select box में option कहाँ change करना हैं।

    
अब धीरे धीरे ट्रेनिंग वाले दोस्त छूटते चले जाते है, कुछ MS के लिए usa चले जाते है तो कुछ mba के लिए Amity, SRM, Manipal चले जाते हैं तो एक बार फिर कॉलेज के फाइनल ईयर के दिन याद आ जाते हैं। वो पेंट्री में कॉफी के मग के साथ बैठ कर Game of Thrones डिसकस करना, तो कभी Friends की सारी सीरीज को एक बार फिर देख लेना तो कभी EMI पर लिए one plus या iphone के फीचर्स डिसकस करना, पता नही दिन कहा निकल जाते है लेकिन जब से प्रोजेक्ट असाइन हुए है सिर्फ गिने चुने दोस्त बच जाते है। वक्त कब UT/SIT में निकल जाता है पता ही नही चलता । clash of titans की जगह अब एक्सेल शीट और टेस्ट केसेज की जद्दोजहद में वक्त निकलता जाता हैं, धीरे धीरे बन्दा अकेला होता जाता हैं ।

    
महीने के अंत मे अपने काम को देखता है तो 1 CR, 1IM या छोटे -मोटे बग फिक्स करने में ही निकल जाता है लेकिन अब ज्यादा सोचना बंद कर देता है और फ्लो में बहने में ही अपनी भलाई समझने लगता है। कोड रिव्यु के नाम पर सिर्फ ग्लोबल और लोकल वेरिएबल के नाम चेंज करता हुआ नजर आने लगता है, अब धीरे धीरे स्कूप-वहूप से आगे बढ़कर stack overflow पर नज़र मारना शुरू कर देता है, सही बोले तो सत्य का ज्ञान हो जाता हैं कि कॉलेज में भी कुछ हमसे उखड़ा है नही , अब कैरियर में भी ऐसा कुछ न हो जाये ।

    
अब testing team से पाला पड़ता है, ये वो लोग होते है जो आप चाहे जो करलो , खुश नही हो सकते, एक दम पत्नी की तरह। अगर कुछ गलत नही भी मिला तो वेरिएबल के नाम मे camelCase  की गलती निकाल देंगे। फिर शुरू होता है NCR, RCR का खेल, आदमी एक बार बैंगलोर/गुड़गावं के ट्रैफिक से बच जाए लेकिन इनसे आज तक कोई नही बच पाया। इनके लेवल भी इतने होते है कि उतना तो हम code change नही करते। लोकल टेस्टिंग टीम, रीजनल टेस्टिंग टीम और बस चले तो हर कंट्री की अलग अलग टीम बनाले और फिर फुटबाल की तरह हमारे कोड के साथ खेला जाता है। कमेंट ऐसे ऐसे आते हैं कि इतना तो गर्लफ्रैंड भी रिचार्ज नही करवाने पर नही डाँटती, यही आकर बन्दा सारी शर्म छोड़ देता है और बन जाता है कूल क्योंकि टेस्ट टीम के कमेंट वैसे भी इग्नोर करने के लिए ही होते है।

    
अगर इस महामारी के बीच भी टाइम मिल जाये तो status call शुरू हो जाता है, ये एक तरह से व्रत की तरह है जैसे आज सोमवार है तो APJ टीम के साथ स्टेटस कॉल, मंगलवार को EMEA टीम तो बुधवार को AMS टीम, ऐसे लगने लगता हैं कि एक ही चीज़ को तीन बार बोल के नर्सरी की rhymes के रटे याद आ जाते है। पहले तो इस मीटिंग में शुरू के एक दो हफ़्तों में Hello everyone और thanks के अलावा कुछ होता है ही नही, ऐसे लगता है जैसे बाबाजी के यहाँ मत्था टेकने आये हैं फिर स्टेटस के नाम पर बेइज़्ज़ती ओर feel होती हैं कि एक select box में option change करने के लिए 1 महीना लग रहा है और उसको जस्टिफाई भी करना पड़ता । आधी बार तो अलग अलग इंग्लिश एक्सेंट के कारण बाकी लोगों की बात ही समझ नही आती है, वहाँ फिर ok इज्जत बचा लेता हैं।

क्रमशः

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