​प्रथम रेलयात्रा

 

रेलगाड़ी का नाम सुनते ही दिमाग मे कई तरह के विचार आने लगते है, वो कभी न मिलने वाले कन्फर्म टिकट, लेट पहुँचना और भीड़, और सिर्फ भीड़ । भले ही अब बजट मिक्स कर दिए हो लेकिन हालात आज भी ज्यादा नही बदले है लेकिन एक ईमानदार कोशिश ‘प्रभु’ के द्वारा की जा रही हैं। जब एक ट्वीट पर पूरा सरकारी महकमा आपके सामने हाज़िर हो जाता है तो विश्वास नही होता है कि हम भारत में ही रह रहे हैं, ये तो ट्वीटर बनाने वाले ने भी नही सोचा होगा कि भारतीय रेलवे इस तरह इसका उपयोग करेगा ।

 

मैने भी ट्रेन में बहुत सफर किया है लेकिन जो आनंद पहली नज़र और सफर में आता है , वो शायद ज़िंदगी में वापस जीने को नही मिलता । इसकी शुरुआत हुई थी 2005 की गर्मियों की छुट्टियों में, तब मैं दसवीं की परीक्षाएं दे चुका था और लगभग 3 महीने की छुट्टियां थी तो इस बार गाँव में छुट्टी मनाने का बिल्कुल मन नही था क्योंकि अब यही लग रहा था कि अब दसवीं के बाद मज़े ही मज़े है, एक बार बोर्ड की परीक्षा पास हो गए तो  जीवन मे सब कुछ पा लेंगे । प्लान तो पहले से ही बन गया था लेकिन प्लानिंग तो हमारे ‘योजना आयोग’ की तरह कभी बनी नही क्योंकि राजस्थान बोर्ड के 43% रिजल्ट से अच्छे-अच्छे ख़ौफ़ खाते थे, हम तो फिर भी बच्चे थे उस समय। हम तो इंतज़ार कर रहे थे कि अच्छे से पेपर खत्म हो जाये, बोर्ड परीक्षा का भी अपना अलग ही रोमांच होता है, वो बस की छत पर बैठकर पेपर देने जाना, किसी और दिन इस का वर्णन करेंगे।

 

अब धीरे धीरे यात्रा करने का समय नजदीक आ रहा था । रिज़र्वेशन का दूर दूर तक कोई निशान नही था क्योंकि उस समय ने तो टिकट कन्फर्म होती थी, न ही इतने पैसे हुआ करते थे और शायद IRCTC भी नही थी और थी भी तो हमे उसके बारे में पता नही था और होता तो भी क्या उखाड़ लेते क्योंकि टिकट तो 4G में भी बुक नही होते हैं तो उस टाइम तो G का भी कहीं अता पता नहीं था।

 

यात्रा का यू था कि हम कुल 7 लोग थे जो यात्रा कर रहे थे, उनमे से 2 लोग हम(एक मै और दूसरा मेरा दोस्त) थे जो पहली बार रेल से यात्रा कर रहे थे। स्टेशन घर से लगभग 70KM था और ट्रेन सुबह की 7 बजे थी , उस समय यातायात के इतने साधन थे नही की, सुबह जल्दी ट्रैन के समय से पहले पहुंचा जा सके तो यह तय हुआ कि ट्रेन के समय से एक दिन पहले हम रेलवे स्टेशन पहुंच जाएंगे ।

 

प्लानिंग के मुताबिक एक दिन पहले ही सब तैयारियां पूरी हो चुकी थी, मेरा भी बैग पैक कर लिया गया । एक छोटे से बैग में जरूरी सामान और कपड़े , जी हां उस समय मोबाइल और चार्जर का झंझट नही था, न ही ट्रेवल प्लेलिस्ट की जरूरत पड़ी, न ही JBL के हेडफोन थे, न ही wildcraft का बैग, न ही पावर बैंक , न रोमिंग , न इनकमिंग । सब कुछ सामान्य था, वो हँसी-खुशी और पढ़ने के लिए कुछ किताबें। उसके साथ ही लगभग एक टन मां की हिदायते और दिशा निर्देश, अगर आज का दौर होता तो IRCTC की terms एंड conditions पढ़ने के लिए बोल देती। लगभग 3 टाइम खाने के लिए खाना बना लिया गया क्योंकि बाहर का खाना, न पेट से हजम होता था और न ही जेब से।

 

अब घर से निकलने का समय निकट आ रहा था तो माँ के दिशा निर्देश देने की स्पीड दुगुनी हो गयी थी और ईश्वर को याद करके,  दही और गुड़ खाकर बस स्टैंड के लिए निकल गए, जहां सब लोगो को इकठ्ठा होना था। लगभग 1 घंटे के इंतजार के बाद बस आयी और हम रवाना हो गए अपने गंतव्य के लिए, मन में अभी भी ट्रेन में बैठने का रोमांच या उतावलापन था ही,ऐसा लग रहा था कि बस आज इतनी धीरे क्यो चल रही है। इतना उतावलापन तो शायद एक प्रेमिका, अपने प्रेमी के लिए नही होती लेकिन बाल मन का क्या करे, उत्सुकता तो रहेगी ही उसमें।

 

अब रेलवे स्टेशन पहुंच चुके थे तो झट से अंदर घुसे और पहली बार ट्रैन को इतनी नजदीक से देखा और महसूस किया । अगला कुछ समय मालगाड़ी के डिब्बे गिनने में निकल गया और कन्फर्म नही कर पाए कि टोटल कितने डब्बे होते है, हर बार या तो गिनती में गड़बड़ हो जाती थी या शायद हर मालगाड़ी में डिब्बे अलग अलग होते है, ये रहस्य तो अभी तक भी समझ नही आया।

 

अब लगभग 2 घंटे बीत चुके थे और रात के 10 भी बज चुके थे तो अनमने मन से प्लेटफॉर्म के बाहर आ गए क्योंकि ट्रैन तो अगले दिन सुबह 7 बजे की थीं। बाहर आकर सबने मिलकर खाना खाया और प्लेटफॉर्म के बाहर ही खुले में साफ जगह देखकर सोने की व्यवस्था की गई, हमारे हिस्से में सिर्फ प्लेटफॉर्म से पानी लाने का काम आया तो इसमें खुशी भी थी क्योंकि हर बार आपको पानी लाने वक्त ट्रैन या मालगाड़ी के डिब्बे गिनने का मौका मिल जाता। ये सिलसिला लगभग एक घंटे चला और बाद में सोने का आर्डर आ गया । दरी पर चद्दर ओढे हुए तारे गिनते गिनते कब नींद आ गयी पता ही नही चला। इसी दौरान एक ऐसी घटना घटित हुई कि आज भी हम जब याद करते है तो सारे लोग हँसने लग जाते है।
हुआ यूं कि हमारे साथ एक 3 साल का बच्चा भी सफर कर रहा था वो कब अपने पापा की चद्दर से निकल कर मेरी चद्दर में घुस गया पता ही नही चला। जब बच्चे के पिताजी को पता चला कि उनका बच्चा उनके साथ नही है तो उनके एक बार होश उड़ गए। उन्होंने सब को उठा दिया सिवाय मेरे को और फिर शुरू हुआ तलाशी अभियान, सब लोग इधर उधर दौड़ रहे थे उस बच्चे को ढूढ़ने के लिए, सब के हाथ पांव फूल गए थे । कहाँ कहाँ और किस किस से नही पूछा लेकिन लगभग 1 घण्टे तक यह रहस्य ही बना रहा, फिर जब एक घंटे की दौड़ भाग के बाद नही मिला तो उनको मुझे भी उठाना पड़ा, जैसे ही उन्होंने मेरी चद्दर एक तरफ की, हम दोनों सोये हुए थे शुकुन से, दुनिया के झमेले से कई दूर। हम दोनों को सोते देखकर सबने राहत की सांस ली और किसी ने भी हमे उठाने की जहमत नही उठाई। आज वो बच्चा भी बड़ा हो गया है और संयोग देखिये वो भी अभी दसवीं की परीक्षाएं दे रहा हैं
अब ट्रैन का सफर शुरू होने ही वाला था, सब लोग तैयार होकर 6 बजे ही प्लेटफॉर्म पर आ चुके थे, अब इंतज़ार था तो सिर्फ ट्रैन के आने का।

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