प्रथम रेलयात्रा – पार्ट 2

 

 

अब ट्रैन का सफर शुरू होने ही वाला था, सब लोग तैयार होकर 6 बजे ही प्लेटफॉर्म पर आ चुके थे, अब इंतज़ार था तो सिर्फ ट्रैन के आने का। ट्रैन  का समय 7 बजे का था और हम भी समय से पहले ही वहां पहुंच चुके थे लेकिन नेताओं का रैलियों में और ट्रेन को प्लेटफार्म पर समय मे आने पर अपने सम्मान में काला धब्बा सा लगती हैं। इंतज़ार करना शायद संसार का सबसे मुश्किल कामों में से एक है और ये जीवन का बहुमूल्य पाठ हमे सुबह के समय भारतीय रेलवे के द्वारा पढ़ाया जा रहा था । ऊपर से जो बार बार एक महिला के द्वारा ट्रैन की देरी के लिए खेद प्रकट किया जा रहा था , उसे झेलना और मुश्किल होता जा रहा था। आपको चोट लगी हो और कोई उस पर नमक डाले तो चोट से ज्यादा नमक डालने वाले पर गुस्सा आता है।

 

रेलवे स्टेशन पर दो ही प्लेटफॉर्म थे लेकिन इतनी बार ट्रैन आने से पहले चेंज हो गए जितने तो नेता अपने बयान नही बदलते। इसी में हमारी भी कसरत हो रही थी , शायद लोगो को फिट रखने के लिए ये कोई सरप्राइज प्लान हो क्योंकि वो irctc के खाने से तो फिट कर नही सकते। दाल और चावल में एक दो कीड़े अगर नही आये आपकी थाली में तो लगता ही नही कि आप रेल में सफर कर रहे हो।

 

अब ट्रेन धीरे धीरे स्टेशन की तरफ आ रही थी, लगभग 20-22 डब्बे थे कुछ पर S1, S2… लिखा था तो कुछ पर A1, B1 लिखा हुआ था , इसी बीच पता चला कि उसमें रसोई यान भी है , अब उन पगलों को कौन समझाए कि मैने तो अगले 3 टाइम के खाने का इंतज़ाम कर रखा था। इतनी विविधताओं को देख कर ही मुझे विश्वास हो गया कि भारत वाकई अजब-गजब देश है। किसी डिब्बे में ac लगी हुई तो किसी डिब्बे की खिड़की ही टूटी हुई है। कही कुशन वाली शीट है तो कही पर लकड़ी के फट्टे वाली सीट्स थी। कुछ ज्यादा समझ तो नही आ रहा था लेकिन समझकर भी क्या उखाड़ लेते।

इसी बीच ट्रैन स्टेशन पर आ चुकी थी, स्टेशन पर गहमागहमी बढ़ गयी थी, एक दम से सारे चेहरों पर मुस्कान छा गयी थी, सारे वेंडर्स भी राकेट की स्पीड से आगे बढ़ रहे थे और मै भी इंतज़ार कर रहा था कि कब मुझे बैठने के लिए बोला जाये। जब हरा सिग्नल मिल गया तो झट से ट्रेन में बैठने के लिये दौड़ पड़े । वैसे भी हमारी सीट जनरल डिब्बे में थी तो ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के फंडे को जल्दी ही समझ लिया । ट्रैन में भीड़ कम या न के बराबर थी तो हम सब लोग आराम से अंदर बैठ गए, मेरा तो पहले से ही तय था, सिंगल विण्डो वाली सीट पर बैठना है और वैसा ही हुआ, जैसे ही अंदर बैठा लगा, बस अब कुछ नही चाहिए। आसपास ट्रैन में नज़र घुमाई तो लकड़ी के फट्टे की सीट्स थी और ऊपर सामान रखने की जगह थी, लोग आराम से बैठे हुए थे क्योंकि ट्रैन का स्टार्टिंग पॉइंट कुछ दो स्टेशन पहले ही था तो लोग कम ही थे।

 

अब शुरू हुआ ट्रैन का इंस्पेक्शन, पूरी बोगी के दो चार चक्कर तो शुरू के 10 मिनिट में ही लगा लिए, वो पंखे, ट्यूब लाइट , वाश बेसिन और साथ मे ही वाशरूम। सारी सुविधाएं एक साथ देखकर लगा कि कुछ ज्यादा ही आसपास तो नही है , जगह की कमी लगती है। कभी फैन को ऑन-ऑफ करना तो कभी मुँह धोने के बहाने वाश बेसिन के पास जाना।

 

इसी उठापटक के बीच ट्रैन चल पड़ी तो मैं झट से अपनी सीट पर आ गया और पीछे छूटते स्टेशन को देख रहा था, लोग लास्ट मिनट में दौड़ते भागते चढ़ रहे थे। मेरा मन भी ट्रेन की स्पीड के साथ ही सारी यादे जोड़ने में लगा हुआ था, क्या करे उस टाइम फेसबुक नही था वरना एक चेक-इन ही सारी कहानी समझा देता है और न ही हैशटैग थे तो फालतू के झंझट से वैसे ही बच गए ।  ट्रैन अपनी रफ्तार पकड़ रही थी और मैं उस सफर का आनंद ले रहा था , जितनी यादे समेट सकते है उतनी समेट रहा था।

 

अब टिकट चेकिंग के लिए टीटी भी आ चुका था तो सारे लोगो में हड़कंप मच गया, उस टाइम तो मैं ज्यादा समझ नही पाया लेकिन बाद की ट्रेन यात्राओं में मैने भी खूब महसूस किया। उस टाइम जनरल के टिकट ज्यादा फैंसी नही थे , सिर्फ एक मोटे कागज़ ( गत्ते जैसा मोटा) पर स्टेशन कोड के साथ किराया लिखा हुआ था। जब टिकट देखने के बाद टीटी संतुष्ट हो गया तो सभी ने राहत की सांस ली क्योंकि वैलिड टिकट की इम्पोर्टेंस वो ही समझ सकता है जिसे बिना टिकट के पकड़े जाने पर अगले स्टेशन पर उतार दिया गया हो । मुझे इस पूरे प्रोसेस में ज्यादा इंटरेस्ट था ही नही क्योंकि मेरे साथ वाले अंकल जी हमारी तरफ से मोर्चा संभाले हुए थे।

 

अब जल्द ही हमारे अच्छे दिन जाने वाले थे क्योंकि अगला स्टेशन आने वाला था तो हिदायत दी गयी थी कि किसी भी स्थिति में अपनी सीट नही छोड़नी है, अब उनको कौन समझाए कि विण्डो वाली सीट वैसे भी कोन कमबख्त छोड़ता है। इस हिदायत को अनसुना करते हुए बाहर के नजारे देखने मे ही बिजी थे। अब अगला स्टेशन आ गया था, पता ही नही चला कब 2 घंटे गुजर गए, नीचे से वेंडर्स की कर्णभेदी आवाज शुरू हो चुकी थी तो वो ही सैम ऑन्टी इस स्टेशन पर भी खेद प्रकट कर रही थी। एक हुजूम सा आया प्लेटफॉर्म पर और कुछ उतरे लेकिन उससे कही ज्यादा चढ़ गए, उस समय मुझे लगा कि हर स्टेशन पर लोग चढ़ने पर ट्रेन में एक नया डिब्बा जोड़ दिया जाता है तभी ट्रैन में इतने डिब्बे होते है लेकिन मुझे क्या पता था कि ये वहम अगले कुछ घण्टो और स्टेशन्स के बाद ही फुर्र होने वाला है।

क्रमशः

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