प्रथम रेलयात्रा – पार्ट 3

 

​रेलयात्रा में अब धीरे धीरे भीड़ बढ़ रही थी और हमे गाँव की खुली गलियों की जगह शहर की संकरी सड़के जैसे हालात लग रहे थे। अगर आपको भारत दर्शन  करना हो तो कभी जनरल बोगी में बेठकर सफर कीजिये, इतने दार्शनिक, नेता, कॉमेडियन, खडूस, बाबा जी मतलब सब टाइप के लोग मिल जाएंगे। अब मेरे से भी विण्डो वाली सीट छीनने वाली थी तो हम लोगो ने प्लान बनाया कि दोनों दोस्त उस एक  सीट पर ही बैठेंगे और बारी बारी से जगह बदल कर नज़ारों का आनंद लेंगे। अरावली की पहाड़ियां अब नजदीक आ रही थी, कही पर बहुत ऊची जगह थी तो कही पर टनल थी, एक बार के डर भी लग रहा था कि अगर ट्रैन टनल में बंद हो गयी तो उसे बाहर कैसे निकलेंगे।

 

ट्रैन अठखेलिया करती हुई अरावली की गोदी में गुजर रही थी, जहाँ घने जंगल थे तो कही ऊँचे पहाड़, ये सब देखकर दिल खुश हुआ जा रहा था। अब अगला स्टेशन आबू रोड था तो लगने लगा कि स्टेशन से ही पूरा एरिया घूम लिए , क्योंकि माउंट आबू  राजस्थान की मसूरी के नाम से प्रसिद्ध है और हो भी क्यो ना जहाँ लोग थार से आगे नही बढ़ते वहाँ हिल स्टेशन होना बड़ी बात है। तभी बाहर राबड़ी के लिए वेंडर्स ने आवाज़े लगाना शुरू कर दी, मुझे भी अंकल जी की परमिशन के बाद राबड़ी पीने का सौभाग्य मिल ही गया। कल्पना में ही पूरे माउंट आबू की सैर करके आ गया, वो  सनसेट पॉइंट (तपती दोपहरी में कल्पना करना), नक्की झील, गुरु शिखर और ईश्वरीय संस्थान, वैसे ये चाहत तो अभी भी पूरी नही हुई, मौका मिला तो जरूर एक चक्कर काट आएंगे माउंट आबू का।

 

अब धीरे धीरे राजस्थान  छोड़ कर गुजरात  मे प्रवेश कर रहे थे तो प्लेटफार्म के बोर्ड भी अब चेंज हो रहे थे, गुजराती भाषा से अब पाला पड़ रहा था लेकिन देवनागरी लिपि होने के कारण टूटी फूटी समझ मे भी आ रही थी। अभी ट्रैन में डीजल इंजन लगा हुआ था तो मोड़ पर धुंआ साफ दिखाई देता था, डबल ट्रैक था तो बगल से ही तेज रफ्तार में ट्रेन तो कभी मालगाड़ी निकल रही थी। पास में ही सड़क मार्ग था लेकिन आज हम थोड़े ऊपर के लेवल में थे, बस और अन्य वाहन बहुत ही स्लो स्पीड में लग रहे थे। ट्रैक के आसपास एक पूरी दुनिया रहती है लेकिन स्टेशन के पास पुराने घरों के बारे में समझ नही आ रहा था, राजस्थान में तो पुराने किले और हवेलियाँ है तो पुराने घर भी हो सकते है लेकिन गुजरात मे भी वही स्थिति थी तो लगा कि वर्ल्ड हेरिटेज में गुजरात भी राजस्थान के साथ कदमताल मिलाना चाहता है।

 

अब खेजड़ी और बबूल की जगह आम और जामुन के पेड़ नज़र आ रहे थे तो बाजरा के खेतों की जगह केले के बगीचों ने ले ली। अब समझ आ रहा था कि गुजरात इतना समृद्ध क्यो है क्योंकि वहाँ पर खाली जगह तो मिली ही नही रही थी, मुझे क्या पता था कि 1 रूपये में यहाँ हज़ारो एकड़ नैनो प्लांट को दे दी जाती है वो भी एक मैसेज से, शायद राजस्थान में नेटवर्क कम आता होगा bsnl का क्योंकि जगह की तो कोई कमी नही है ।

 

अब अहमदाबाद  पहुचने वाले थे तो अजीब ही उत्साह था, पूरे शहर को देखने का, लेकिन कुछ बड़ी बिल्डिंग के अलावा सिर्फ झुग्गी झोपड़ी ही नजर आ रही थी शायद ट्रैन के शोर के कारण बड़े लोग नही रहते होंगे रेल्वे ट्रैक के पास । अब भीड़ का हुजूम बढ़ रहा था और हमारी सीट खोने का खतरा भी।

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