​कड़ी निंदा की कड़ी निंदा !

 

कड़ी निंदा ऐसा शब्द है जिसकी अब कड़ी निंदा करने का मन कर रहा है। निंदा शब्द जिसने भी बनाया हो, लेकिन जिसने उसके आगे कड़ी शब्द जोड़ा है उसे शांति का नोबेल पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन किसी चौक में खड़ा करके गोली से उड़ा देना चाहिए।

 

ये शब्द जब पहली बार सुना तो शायद कम समझ आया क्योंकि कोई आपके भाई को मार कर चला जाता है और आप बस कड़ी निंदा ही करते रहोगे । विकास या देश के संपन्नता के कई मानक हो सकते हो लेकिन अच्छे दिन या न्यू इंडिया तब ही काम आएंगे जब इंसान जीवित रहेंगे।

 

जब मुंबई /पठानकोट में हमले होते है तो आप कड़ी निंदा करते हो, दंतेवाड़ा या सुकमा में हमले होते है तो आप कड़ी निंदा करते हो, कश्मीर में पत्थर फेंके जाते हो या जेनयू/जादवपुर यूनिवर्सिटी में तथाकथित आज़ादी के नारे लगते हो या अरुणाचल प्रदेश में चीन घुसपैठ करता हो या यूपी में ट्रेन हादसे होते है तब कड़ी निंदा करते हो । कड़ी निंदा न होकर मंदिर का घण्टा हो गया जिसका जब मन चाहा जैसे मन चाहा बजा लिया।

 

क्या कड़ी निंदा आपकी नाकामी छुपाने का जरिया बन गया है या ‘मुख्य धारा‘ के चोचलों के आगे कभी बढ़ ही नहीं सकते । एक सर्जिकल स्ट्राइक के दम पर यूपी का इलेक्शन जीत आये हो लेकिन छत्तीसगढ़/कश्मीर  की नाकामियों को छुपाने के लिए क्या करोगे। कब कोई ठोस कदम उठाया जाएगा, कभी 70 तो कभी 26 crpf के जवानों के बलिदान का कोई महत्व नही है।

क्या वीर भारत के जवान वेब साइट बनाने  से ही ये बेसिक समस्याओं का समाधान हो जायेगा। खून तो तब खोल उठता है जब कभी सोते हुए या कभी खाना खाने के लिए बैठे वीरो पर घात लगा कर हमला किया जाता है । अब कहा गए वो ह्यूमन राइट्स वाले जो मोमबत्तियां लेकर घुमा करते है, उन्हें कश्मीर की पैलेट गन तो नज़र आती है लेकिन 800 के लगभग घायल हुए जवान नज़र नही आते। उन्होंने कभी भी उग्रवादियों या नक्सलियों के हमलों के बाद कभी भी रोना रोते नही देखा शायद उनकी डिक्शनरी में जवानों के मानवाधिकार है ही नही।

 

अब सहन करने की क्षमता नही रही साहब,  जो लोग इस देश की अखंडता और विविधता में सरोकार नहीं रखते उन्हें मुख्यधारा में लाने का क्या फायदा। कब चंद वोटों और राजनीति के ऊपर देशहित में फैसले लिए जाएंगे, कब एक शहीद जवान की शहादत EVM की गड़बड़ी से कम महत्वपूर्ण हो गयी ,पता ही नही चला। जब कोई अजान या कीर्तन या जागरण के लिए बोल दे तो आपकी भावनाए आहत हो जाती है और धमकियां, फतवे और भी न जाने क्या क्या लेकिन कब ऐसे ही देश के लिए जान देने वालो के लिए आपकी कलम आग उगलेगी, न्यूज़ चैनलों की स्क्रीन कब काली होगी, अखबार में कब विज्ञापनों की जगह कुछ सकारात्मक खबर मिलेगी या सोशल मीडिया कभी मेमेज़ और फोटोज शेयर से आगे बढ़ कर इन वीरो की गाथाएं पब्लिश होगी और कब आपके अन्तःकरण से ज्यादा दिल मे तकलीफ और आंखों में आंसू आएंगे।
दिल्ली में बैठे हुक्मरानों से उम्मीद करते है कि कब आप ठोस कदम उठाएंगे नही तो कड़ी निंदा करने के लिए तो हमारे पास मनमोहन भी थे , इस जमात की कोई कमी नही है।

सुकमा में शहीद हुए सभी भारत माता के वीर सपूतों को श्रद्धांजलि एवं आपके बलिदानों पर हमें गर्व है । 

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