प्रथम रेलयात्रा – पार्ट 4

अब अहमदाबाद पहुचने वाले थे तो अजीब ही उत्साह था, पूरे शहर को देखने का, लेकिन कुछ बड़ी बिल्डिंग के अलावा सिर्फ झुग्गी झोपड़ी ही नजर आ रही थी शायद ट्रैन के शोर के कारण बड़े लोग नही रहते होंगे रेल्वे ट्रैक के पास । अब भीड़ का हुजूम बढ़ रहा था और हमारी सीट खोने का खतरा भी।

 

अब ट्रैन प्लेटफार्म पर पहुचने वाली ही थी तभी पता चला कि यह यहां पर आधा घंटा रुकेगी और यहाँ पर ट्रेन का इंजन बदलेगा , डीजल से ये इलेक्ट्रिक हो जाएगा , अब इनको कौन समझाए कि ट्रेन इंजन से नही लोको पायलट के हौसलों से चलती हैं, भले ही बुलेट ट्रेन चला लो लेकिन ट्रैन का लेट होना तो विधि का विधान हैं।

 

अब उत्सुकता ज्यादा थी कि ट्रेन का इंजन कैसे बदलते है और उसे बदलते देखना भी था लेकिन भीड़ को देखकर एक बार तो सारे प्लान चौपट होने के आसार बन गए थे लेकिन पांच दस मिनट में जब थोड़ा सा माहौल सही हुआ तो लगा कि अब ये इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना भी देख लेंगे। अंकल जी से परमिशन के बाद झट से ट्रेन से उतरे , जैसे ही नीचे उतरे तो देखा यहाँ तो अलग ही नजारा हैं, चारो तरफ ट्रैन ही ट्रेन लगभग 10 के ऊपर प्लेटफार्म औऱ ट्रेनों की गड़गड़ाहट के साथ शोरगुल हो रहा था , एक बार तो लगा कि ये अपने बस का नही है, ट्रैन में वापस चढ़ने में ही भलाई है लेकिन फिर लगा कब ट्रैन का इंजन बदलते देखेंगे।

 

 

पहली बार तो मुझे ट्रैन के इंजन की डिज़ाइन समझ नही आई, ठीक वैसे ही जैसे आजकल राजनीतिक पार्टियों को EVM समझ नही आती। एक तो इतना बड़ा इंजन और कोने में एक दम पीछे की तरफ लोको पायलट के लिए जगह, ये तो अच्छा है कि रेल की पटरियों पर कोई और नही आता बाकी लोको पायलट को दूसरी तरफ का तो कुछ दिखता ही नही। अब कुछ ट्रैकमैन ट्रैन के इंजन को अलग करने के लिए क्लिप निकाल रहे थे।

 

एक लोहै के क्लिप को देखते ही मेरे होश उड़ गए कि एक छोटे से क्लिप के सहारे इंजन पूरी ट्रैन के डिब्बों को खींच लेता है, इसका मतलब यह था कि अभी तक ट्रेन भारत के जुगाड़ और सरकार की तरह राम भरोसे ही चल रही थीं। उम्मीद पर दुनिया कैसे क़ायम रहती हैं वो उस क्लिप को देखकर समझ आ रहा था। इंजन के उस शोर में भी दिल की तेज धड़कन महसूस हो रही थी लगा कि केवल हमारी ट्रैन में ही ये क्लिप सिस्टम था, बाद में पता चला कि वो तो यू ही वहम था बाकी सब ट्रैन में भी यही होता हैं।

 

अब घूम फिर कर एक इलेक्ट्रिक इंजन हमारे डिब्बो के पास आया, उसके ऊपर एक हुक था जो लगातार बिजली की तार के संपर्क में आ रहा था, थोड़ा बहुत बिजली के बारे में किताबो में पढ़ लिए थे कि लोहा सबसे अच्छा विद्युत वाहक है। अब और डर बैठ गया था कि आज तो करंट लगना निश्चित है। जब रहा नही गया तो पास में खड़े ट्रैकमैन से करंट लगने के बारे में सवाल पूछ ही लिया, पहले तो वो सकपका गए लेकिन बाद में बाल मन की जिज्ञासा समझकर मेरे भय या शंका को वही खत्म करने की कोशिश की। उस टाइम लगा कि एम्पियर या फैराडे जैसे वैज्ञानिकों ने वाकई चमत्कारी खोज की थी।

 

अब इंजन चेंज हो चुका था और मुझे भी सारे सवालों के जवाब, अब अंदर बैठने में ही अपनी भलाई समझी क्योंकि हम जनरल डिब्बे में थे न कि रिज़र्व डिब्बे में। जब वापस लौटकर अपनी सीट पर बैठ गए तो लगा कि कोई बड़ा तीर मारकर आ गए है , ठीक वैसे ही जैसे फ्री wi-fi और अच्छे दिनों के नाम का लॉलीपॉप देकर आजकल के नेता अपना काम निकाल रहे है।

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2 thoughts on “प्रथम रेलयात्रा – पार्ट 4

    • May 11, 2017 at 4:50 pm
      Permalink

      धन्यवाद !
      जब भी ट्रेन में यात्रा करते है तो इस पोस्ट के सारे तथ्य जीवंत हो उठते हैं।

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