हिंदुस्थान – मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी

 

पैदा हुआ आर्यवर्त बनकर , सुख और खुशहाली लाया था 

अपनों और परायों को इसने , सम्मान से रहना सिखाया था
विश्व में ज्ञान-ज्योति का दीप जलाया,तब ही यह विश्व गुरू कहलाया था ॥ 


जवान हुआ हिन्दुस्थान बनकर,अपने बाहुबल से दुनिया को जीना सिखाया था  ।

अपनी मेहनत और लग्न से खूब कमाया,अपने आविष्कारों से दुनिया को परिचित करवाया था 
इसने कठोर परिश्रम से अपार धन कमाया , तभी तो यह सोने की चिड़िया कहलाया था ॥ 


अधेड़ हुआ भारत बनकर , बनते ही भारत ने सम्मान और सम्पति को खोया था 
नजर लगी न जाने किसकी , सब कुछ इसने गंवाया था ।
मुगलों और अंग्रेजो का हुआ था जब ये गुलाम,डाली परतंत्रता ने इसके पैरो में जंजीरे 
अपनी सारी शक्ति , यश को खोकर ये बहुत रोया था ॥ 


बुढा हुआ इंडिया बनकर बेबस लाचार बनकर दुनिया के सामने आया 
इसकी जड़ो को अपनों ने ही काटा ।


ज्ञान देनें वाला गुरू , आज स्वयं ज्ञान के लिए चिल्लाया 
कौन सहायता करने वाला  इसकी , अपनों ने ही जब इसको मार गिराया ॥


( ये कविता देश के हालातों को दर्शाती है और श्री सांवर मल ‘सन्नाटा’ के द्वारा लिखी गयी है, उनकी परमिशन के बाद इस ब्लॉग पर प्रकाशित की जा रही हैं, उनका साभार । )

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