LoC – एक अंतहीन युद्ध !

जब भी LoC का नाम लिया जाता है तो दिमाग मे कई तरह की छवियां उभर आती हैं, कभी बॉर्डर फ़िल्म तो कभी LoC फ़िल्म के सीन याद आ जाते है, बीच – बीच मे डिसकवरी या नेशनल जियोग्राफी की डॉक्यूमेंट्री भी जहन में ताजा हो जाती हैं। कही पर दुर्गम पहाड़िया तो, कही दलदल तो कई फैला हुआ थार मरुस्थल। इससे साफ होता है कि ये जगह रहने योग्य तो नही होती है, अगर होती तो अब तक वाड्रा, DLF या कोई बिल्डर वहाँ पहुंच जाते।
 
शायद देश मे यही एक जगह है जो लगभग हर दिन सुर्खियों में बनी रहती है। लोग सुर्खियों में बने रहने के लिए क्या क्या नही करते, ‘आप’ के ड्रामे हो या दिग्गी के बयान हो या राखी का बड़बोलापन हो या भाई जान का भांजा हो। हर दिन सीज फायर वायोलेशन की खबर आती है, गोलियाँ उधर से भी चलती है तो इधर से भी करारा जवाब दिया जाता हैं क्योंकि LOC पर कड़ी निंदा काम नही आती।
 
किसी दिन घुसपैठ होती है तो उस एरिया को चारों तरफ से घेर कर के ऑपेरशन चलाया जाता है , तो कभी घात लगाकर बैठे मानवता के दुश्मनों से पाला पड़ता है। कभी अफसर शहीद होता है तो कभी सैनिक क्योंकि गोलियां किसी मे फर्क नहीं करती वरना अगर बाबा साहेब का बस चलता तो जनरल के 10 गोली, ओबीसी के 7 गोली , sc के लिए 2 और ST वालो को तो केवल LoC पर घूमने ही ले जाते।
 
इतनी दुर्गम पहाड़ियां होती है कि आम आदमी तो देख कर ही बेहोश होकर नीचे गिर जाए, वहां पर पहले दुश्मनों से दो दो हाथ करो और फिर जान बच जाए तो हमारे कश्मीरी भाई है ही पत्थर फेंकने के लिए। पहले गोलियों को झेलो, फिर गालियों को, पता नही ये जवान किस मिट्टी के बने हुए है जो  इतना  सहन कर लेते है, अगर हम से कोई होता तो अब तक न जाने कितनी बार विश्व युद्ध की नौबत आ जाती। अगर फिर भी कुछ बच जाता है तो हुक्मरानों की कड़ी निंदा बोरे भर भर कर  LOC तक पार्सल कर दी जाती है, भले ही दाल के नाम पर हल्दी का पानी और पराठे के नाम पर जला हुआ पापड़ दिया जाता हो।
 
अब तक क्यो झेलम/सिंधु का पानी उनको दिया जा रहे जो हमारे जवानों के खून की नदियां बहा रहे है, क्यो उनको सालाना 1 लाख करोड़ रुपये के स्पेशल पैकेज दिए जा रहे है जो पत्थरो की भाषा ही समझ रहे है। जब कोई ओना पौना अलगाववादी उनको बहकावे में लाकर पत्थर फिकवां सकता है तो उनकी z plus सिक्योरिटी क्यो न छीन ली जाती है। जब जवानों को OROP देने में मौत आती है, किसानों के कर्ज माफ करने में पसीने छूट जाते है तो क्यो अरबो खरबो डॉलर के हथियार खरीदने की जररूत आन पड़ी।
 
क्या ‘भारत के वीर जवान‘ या video to the nation ही हल है, हालात तो ये है कि आप शहीद जवान को सिर्फ 15 लाख डोनेशन दे सकते हो लेकिन राजनीतिक पार्टियों को चाहे जितना फण्ड दे सकते हो , वो भी गोपनीयता के साथ। साहब सब समझ मे आ जाता है जब आप AC रूम में बैठकर पैलेट गन नही चलाने का हुक्म दिया करते हो, कभी आओ लाल चौक पर, एक आधा पत्थर खाओ सीने या मुँह पर, फिर पता चलेगा आपको । जो लोग 20-25 जवानों के साथ Z-प्लस सिक्योरिटी में चलते है वो कभी घूम कर आये थार में, मां कसम, नानी याद ने आ जाये इस गर्मी में तो कहना

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