सुबह के 6 बजे और अलार्म

सुबह के 6 बजे और अलार्म के बीच जो गहरा संबंध है शायद वो एक बार तो माँ – बेटे के रिश्ते को भी पीछे छोड़ दे। अलार्म का जीवन मे उतना ही महत्व है जितना आदमी को वोट देने में है। स्वयं कभी भी न तो अलार्म सेट करना चाहता है और न ही वोट देना लेकिन दोनों के न होने पर उसके दैनिक और लांग टर्म इतने नुकसान हो सकते है , उनकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

 

सुबह 6 बजे का अलार्म बड़ी आशाओं के साथ रखा जाता है ताकि अगले दिन के सारे काम सुचारू रूप से हो सके लेकिन वोट के साथ भी यही होता है कि अगले पांच साल प्रदेश या देश के सारे कार्य प्रगति के पथ पर हो। अलार्म लगाने के लिए शायद कोई अलार्म बोर्ड नही है वरना देश के सारे सेलिब्रिटी अलार्म लगाने की गुहार करते रहते हैं, बताते कि अलार्म लगाना ज़िन्दगी में कितना महत्वपूर्ण कार्य है।

 

उदाहरण दिए जाते कि फलां हीरोइन सुबह 6 बजे से पहले उठ जाती हैं। अलार्म के साथ सेल्फियों का अंबार लगना शुरू हो जाता, क्या इंस्टाग्राम, क्या ट्वीटर और क्या फेसबुक , सब जगह इसी की चर्चा #हैशटैग के साथ होती । कोई शायर अभी दिल की जगह अलार्म पर शायरियां कर रहा होता तो पढ़े लिखे गीतकार अलार्म पर मुन्नी बदनाम को जोड़ने की कोशिश में लगे रहते। न्यूज़ चैनलों पर कभी न खत्म होने वाली डिबेट (बक-बक) चलती रहती, कभी 6 बजे न उठने पर स्क्रीन काली हो जाती तो कभी अलार्म में सेंसर के बारे में पूरी वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश कर दी जाती। कभी JNU तो कभी जादवपुर यूनिवर्सिटी में भटके हुए या स्वघोषित क्रांतिकारी कश्मीर की जगह अलार्म को अपनी निजता पर हमला मान लेते और इस पर बैन लगाने के लिए नारेबाज़ी होती।

 

जिस उत्साह के साथ रात के लगभग 10 बजे ही अगले दिन के लिए प्लानिंग शुरू हो जाती हैं , पता नही कब लोग वोट के लिए भी कभी 10 मिनट सोचकर , बिना भसड़ मचाये वोट देने चला जाये तो बात ही क्या हैं। एक बात समझ नहीं आती कि jio खरीदने के लिए 100% उपस्थिति होती है तो फिर J&K में 7% ही वोट क्यो पड़ते हैं, उन्हें कौन समझाए कि 33% से पहले तो यूनिवर्सिटी भी पास नही करती फिर आप सरकार क्या खाक बना पाओगे।

 

अलार्म को 6 बजे सेट करना और 6 बजे उठना दोनों अलग अलग बातें है और कभी ये हो भी जाये तो उसे मात्र एक सयोंग माना जाना चाहिए। 6 बजे से शुरू होकर 8 बजे तक जिस जज्बे के साथ अलार्म हमे उठाने की कोशिश करता है , उसको सलाम। लगभग हर दस मिनट में बंद होने के बाद भी वापस अलार्म बजता है तो अनायास ही भारतीय सैनिकों की याद आ जाती हैं जो गोलियां, गालियां, पत्थर खाने के बाद भी बाढ़ हो या आंतकी हमला हमेशा कश्मीरियों की रक्षा के लिए आगे रहते हैं। लेकिन ये बात उनको भी तो समझ आये कि पत्थर या पुस्तक में से किसका चुनाव करना है।

 

अलार्म सेट करते समय हम खुद को ही बेवकूफ बनाने की जुगत में लगे रहते हैं , पता होता है कि 8 बजे से पहले नही उठना हैं फिर भी 6 से लेकर 8 बजे तक हर दस मिनट में अलार्म सेट करते है । नेता भी चुनावों में भरसक प्रयत्न करते हैं कि आपको बेवकूफ कैसे बना दिया जाए, कभी जूमलों से तो कभी फ्री के लॉलीपॉप से तो कभी अम्माँ के नाम पर तो कभी पप्पा के साथ में।

 

ये तो अच्छा है कि अलार्म की कोई जाति या धर्म नही है वरना अब तक तो लेफ्ट/राइट विंग बन जाती तो कभी 4 बजे बजने का आर्डर आ जाता, कभी हरे तो कभी भगवे में रंग दी जाती। कभी दंगे होते तो कभी पत्थरबाजी होती, अलार्म के लिए सब्सिडी दी जाती तो किसी को फ्री में देने की घोषणा।

 

काश ऐसा भी समय आये जब बिना अलार्म के ही नींद उड़ जाये और कमबख्त भूखे पेट किसी को नींद भी कहा आती है जिसकी फसल अभी अभी खराब हुई हो। लेकिन कुछ भी कहो इग्नोर करने की जो क्षमता हम लोगों में है वो तो काबिले तारीफ़ है। हमे जंतर मंतर पर किसान नजर नही आता, गुरुग्राम में टैक्सी में रैप नजर नही आता, तथाकथित लोगो के अपने घरों से पलायन नजर नही आता, ऑफिस में भ्रष्टाचार तो सड़क में रेड सिग्नल नही दिखता । व्यापमं होता है लेकिन हमे गर्व है कि इंदौर सबसे क्लीन शहर है। निगोशिएशन के नाम पर रिफाइनरी को 4 साल लटका दिया जाता, अब मैडम को कौन समझाए कि 4 साल में तो लगभग 1 लाख लोगों को रोजगार मिल जाता जिससे कि उसे किसी दूसरे प्रदेश में जाकर कमाने की जुगत में नही लगना पड़ता।

 

लेकिन कुछ भी कहो जो मजा सुबह 6 बजे सोने में है वो शायद किसी और में नही। (वैसे ये पोस्ट भी 6 बजे लिख दी थी लेकिन जो आनन्द 8 बजे पोस्ट करने में है वो और कहा)

2 thoughts on “सुबह के 6 बजे और अलार्म

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