Satire-on-Indian-Society : तमाशबीनो की अनगिनत टोलियां !

जब सब लोग इस गर्मी में त्राहिमाम कर रहे है तो इसी देश के कुछ कोनो में मानवता शर्मसार हो रही है, जितनी भी घटनाएं वर्तमान कालखंड में घटित हो रही है वो सब भारतीय या मानवीय मूल्यों के पतन का समुच्चय है। एक कवि क्या, ईश्वर की कल्पना से भी ज्यादा घिनौनी हरकतें हो रही हैं जिनका एक स्वस्थ एवं समृद्ध समाज का तो कही पर भी सरोकार नहीं है।

जेहन में कुछ ऐसे सवाल पैदा होते है जिनके उत्तर शायद ही कहीं नजर आते हैं, द्वेषता और स्वार्थपरता ने समाज की जड़ो को ही खोखला करना शुरू कर दिया है जिन सामजिक मूल्यों के स्तम्भों पर हमारी संस्कृति टिकी हुई है। कुछ सवाल तो इतने भयानक होते है कि उनके परिणामों के असर को सोच कर ही अंतर्मन व्याकुल हो जाता है।
एक आम आदमी जहां आजादी के लगभग 70 वर्षो के बाद भी रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में अपनी सारी उम्र खपा देता है और जब उसे मूलभूत सुविधाओं या अधिकारों के नाम पर सिर्फ मनरेगा या अंत्योदय जैसी योजनाओ का झुनझुना दे दिया जाता है तो एक आदमी अपनी पत्नी की लाश को अपने कंधे पर लगभग 20 से 25 km लाद कर उसका अपने पैतृक गांव में अंतिम संस्कार करता है। यहाँ अब सरकारों की नाकामियों के ढोल पीटने से काम नही चलेगा, अब सवाल खुद से करने पड़ेंगे। क्या उस 20 किमी के दायरे में लोग नही रहते है या केवल जीवित लाशें बनकर रह गए हैं जिनके पास शरीर तो है पर शायद वो सिर्फ मशीन बन कर रह गए है । पता नही क्यो मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति कहा जाता हैं, जब उनके ऊपर एक लाश भी मुस्कान के साथ उनके अस्तित्व की बखियाँ उधेड़ती नजर आ रही है।

कोई भी धर्म या सम्प्रदाय विशेष हो एक बार आदमी की मृत्यु हो जाने पर उसके अंतिम संस्कार की रस्मे निभाना बहुत ही अनिवार्य एवं आवश्यक है, अब यहां चिंता की यह बात है कि एक माँ को अपने बेटे को गिरवी रखकर अपने पति का अंतिम संस्कार करना पड़ा। ये पतन की पराकाष्ठा है जहां एक मनुष्य मानवता की धज्जियां उड़ाते हुए एक व्यक्ति के मरणोपरांत उसके अंतिम संस्कार में भी अपना स्वार्थ ढूढ़ने में लगा हुआ है। ये उदाहरण केवल एक जगह नही बल्कि पूरे भारतवर्ष में देख ने को मिल जाते हैं, जहां कभी दलित का शोषण होता है तो कही गरीब को सताया जाता है तो कही एक पूर्वांचल की बेटी के साथ घोर अपराध किया जाता है। हैवानियत की सारी सीमाए लांघकर समाज के वहशी दरिंदे अपनी हवश मिटाने के लिए एक लड़की का सब कुछ तबाह कर देते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं सुनने या देखने को मिलती है तो खून खोल उठता है, विद्रोह की अपार संभावना का आवेग मस्तिष्क में छा जाता हैं।

लानत है ऐसे विकास और समृद्धि पर, 

जहाँ स्त्री और बड़े बुजुर्गों का सम्मान नही ।

गरीब और दलित जहां खून के आंसू रोये, 

वो समाज, समाज कहलाने के लायक नही ।।

    

वो तमाशबीनों की अनगिनत टोलियां, 

जो हर बार हो रही मानवता के पतन पर शर्मसार नही ।

अंतिम संस्कार के लिए बेटो को बेचना पड़े, 

वो खरीददार इंसान कहलाने के काबिल नही ।।

   

शर्म से झुक जाती है आंखे हमारी,

जब घर की बहू-बेटियाँ सूरज के उजाले में भी सुरक्षित नही।

उन हैवानों को मृत्युदंड से भी कड़ा दंड मिले,

जिनके कर्मो से स्वयं ईश्वर को भी अपनी कृति पर विश्वास नही।।

  

जब पढ़ने के लिए धरने पर बैठी लाडली,

आठ दिनों तक सरकारों के कानों पर जूए रेंगती नही।

छेड़छाड़ के चक्करों से अब इनको मुक्ति मिले,

नही तो इस देश के सर्वनाश में कोई अब  कसर बाकी नही।।

 

कुछ प्रश्न अपने अंतर्मन से भी आने चाहिए क्योंकि जब तक आप नही सोचोगे तो कब तक नए अवतार का इंतजार करोगे, कब तक मानवता यू ही शर्मसार होती रहेगी, कब एक सभ्य समाज का सपना साकार होगा, सवाल बहुत सारे है लेकिन जवाब भी तो ढूढ़ने ही पड़ेंगे।

 

ऐसे ही अंतर्मन को झकझोर देने वाली एक और कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ।

Copyright © 2017 – Jagdish Jat

2 thoughts on “Satire-on-Indian-Society : तमाशबीनो की अनगिनत टोलियां !

  • May 17, 2017 at 1:01 pm
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    जितना अच्छा लिखा है उतनी ही जरूरत हम सबको कुछ करने की भी है ।

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    • May 17, 2017 at 2:42 pm
      Permalink

      बिल्कुल सही कहा आपने, जब तक सब लोग कोशिश नही करेंगे तब तक ये देश और समाज नही बदलेगा। हम सब को मिलकर आगे बढ़ना पड़ेगा।

      Reply

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