कलम अगर आग उगलने लगे तो निश्चय ही क्रांति है ।

​कलम अगर आग उगलने लगे तो निश्चय ही क्रांति है  by Jagdish Jat

तुझे खुश होने का कोई हक नही, 

ये तूफान से पहले की संभल जाने की शांति है ।

उसमे कोई शक नहीं हर जीवन में कष्ट का है दौर,

कलम अगर आग उगलने लगे तो निश्चय ही क्रांति है।।

     

दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना,

आकाश से तारे तोड़ लाने के भाँति है ।

जब हल चलाने वाले हाथ जब सब छोड़,

बंदूक पकड़ने लगे तो निश्चय ही क्रांति है।।

     

निकल पड़े साहेब असलहों के साथ ,

अपने काफिलों के संग ही खुशी ज्यादा होती है।

हो रहे है जश्न अपने अपने अंदाज और आवाज में,

जनता का गुस्सा फूट पड़ा तो निश्चय ही क्रांति है।।

    

बॉर्डर पर अभी भी तनाव बना रहता है,

पत्थरो और गोलियों के बीच नींद कहाँ आती हैं।

तिरेंगे के लिए जीवन लगा देने के बाद भी,

शहीदों से सबूत मांगे जाए तो निश्चय ही क्रांति है।।

    

सबको अपना वंश बढ़ाने के लिए बेटे चाहिए,

ऐसी मानसिकता में बेटियां कहाँ जन्म ले पाती है।

चाँद और एवेरेस्ट पहुंचकर या राष्ट्रपति बनकर भी,

गर्भ में ही बेटियां मार दी जाए तो निश्चय ही क्रांति है।।

    

चारो तरफ कंक्रीट के साम्राज्य बना लिए है,

अब पेड़ो से ठंडी हवा या शीतलता कहा आ पाती है।

सब लोग पर्यावरण को हानि पहुचाने में लगे हुए है,

अकाल और सुनामी के आ जाने पर  निश्चय ही क्रांति है।।


Copyright © 2017 – Jagdish Jat

4 thoughts on “कलम अगर आग उगलने लगे तो निश्चय ही क्रांति है ।

  • May 27, 2017 at 10:55 pm
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    बहुत सी महत्वपुर्ण बाते आपने अपनी कविता में उठाई है. काश लोग इन समस्याओं के बारे में आपकी तरह सोचे.

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    • May 28, 2017 at 8:09 am
      Permalink

      लोगों को जागरूक करने के लिए कविता और साहित्य बहुत ही उत्तम माध्यम है। उम्मीद है कि कभी न कभी तो लोग बदलेंगें 👍

      Reply

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