Hindi Satire : शिक्षा के हालात हुए खस्ता !

शिक्षा के क्षेत्र में भारत बहुत उन्नति कर रहा है , सरकार जहाँ हर साल नए IIT और AIIMS खोल रही है तो छात्र भी 34% परिणाम देकर राज्य एवं देश दोनों को गौरान्वित कर रहे है। हर साल चमत्कार देखने को मिल रहा है जहां CBSE और ICSE बोर्ड के छात्र 99.4% अंक ला रहे है तो बिहार बोर्ड में हर साल टॉपर घोटाला हो रहा है।

1837 के लार्ड मैकाले की नौकर बनाने की शिक्षा पद्धति के यह हाल हो गए है कि एक चपरासी की भर्ती में MBA और B. Tech के छात्र लाइन में लगे हुए हैं। समझ में यह बात नहीं आ रही हैं कि पेशेवर रोजगार के मौको में इतनी कमी हो गयी है या पेशेवर कोर्स के अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। इतने कॉलेज खुल गए हैं कि छात्र B. Tech के बाद कैरियर के ऑप्शन के बारे में सोचते हैं फिर चलता है अगले 2-3 साल में बैंक , SSC या कोई भी सरकारी नौकरी की जुगत में गुजर जाते हैं।

 

अभी व्यापमं से उबरे ही थे कि बिहार टॉपर घोटाले ने दस्तक दे दी, एक जहाँ फर्जी डॉक्टरों की खेप तैयार कर रहे हैं तो एक तरफ टॉपर्स की फैक्टरी खोल रखी है। जहाँ व्यापमं में अब तक लगभग 40 लोगों की जान ले चुका है तो दूसरी तरफ गिरफ़्तारियों का दौर चल रहा है जो लितापोती के बाद खत्म हो जाएगा।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेना आज भी मंगल ग्रह पर मानव भेजना जितना ही मुश्किल है और उसकी कट ऑफ हर साल भारतीय शिक्षा पद्धति का मज़ाक उड़ाती है। CBSE के मार्क्स के सामने तो राज्य सरकार के बोर्ड तो पानी भरते हुए नजर आते हैं क्योंकि 99.4 %के सामने तो 88 % कही पर टिकते हुए नजर नहीं आते हैं।

यहां पर एक वाकये का उदाहरण देना चाहूंगा, 2008 में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के वाणिज्य संकाय के टॉपर को श्रीराम कॉमर्स कॉलेज में एडमिशन नही मिला क्योंकि उसकी कट ऑफ 98% थी तो हमारे टॉपर के 88% ही बने थे। सारी जुगत के बाद भी वो प्रवेश नही ले पाया लेकिन CA प्रवेश परीक्षा में जरूर देशभर में प्रथम स्थान प्राप्त किया था ।

शिक्षा पद्धति के खस्ताहाल होने में आरक्षण ने आग में घी का काम किया है। इस मुद्दे पर वैसे भी ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप सब भुगत भोगी हो या रेवड़ी खाने वाले हो। इस मुद्दे पर किसी और दिन बात करेंगे।

फ़र्ज़ी अंक तालिका हो या नकल के हाई टेक तरीके , इससे कोई आयोग या बोर्ड नही बचा हुआ है। अंक पाने की दौड़ में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ही खत्म होता जा रहा है। अब सभी को सोचने के साथ ही कुछ कारगर उपाय करने होंगे नही तो बेरोजगारी और डिप्रेशन कभी भी बढ़ी क्रांति या आंदोलन का रूप ले सकता हैं।

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