Hindi Poem: पालता हूँ पुरी दुनिया को, फिर भी कर्जदार हूँ।

खेतों में से उठा हूँ, मिट्टी में पला बढ़ा हूँ ।
कर्ज के बोझ तले दबा हूँ,तो भी खड़ा हूँ ।।

ज्वार-बाजरा-चावल उगाता हूँ,फिर भी भूखा हूँ।
घी-दुग्ध-दही-मक्खन बनाता हूँ, फिर भी सुखा हूँ।।

सुखी पडी हे जमीन मेरी फिर भी जमींदार हूँ।
पालता हूँ,पुरी दुनिया को फिर भी कर्जदार हूँ।।

इतिहास गवाह हैं कि मैने अपने भुजबल से इस धरती को सींचा है।
यदि बेल थके तो धरतीपुत्र बनकर हल को अपने कंधो पे खींचा है।।

सरकारों ने मुझ पर इतने अत्याचार किये अब यही कसर बाकी थी।
हद पार कर दी अत्याचारों की मंदसौर में शैतानो के रूप में खाकी थी।।

इन अत्याचारों के बाद में भी बता देना मै ही कसूरवार हूँ।
पालता हूँ, पुरी दुनिया को फ़िर भी कर्जदार हूँ।।

अर औ सरकार के ठेकेदारों कभी महलों से बाहर निकल कर खेतों की और देखा होता।
पल भर के लिए ही सही जेठ की दुपहरी में अपने तन को कड़कती धूप में सेंका होता।।

काश भगवान ने तुम्हें भी दी होती जिन्दगी किसान की तरह खेतो मे हल चलाने की।
तो आज तुम्हारी हिम्मत नही होती यु अन्नदाताओं पर गोली चलाने की।।

आज तुम्हे बता दूँगा की मै कितना असरदार हुँ ।
पालता हुँ पुरी दुनिया को फिर भी कर्जदार हुँ  ।।

पांच लाख कभी दस लाख तो कभी एक करोड़ मे मेरी जान को न तोला होता ।
यदि तुमने सर्दी – गर्मी मे एक किसान को खेतो मे फसलो के साथ मरते देखा होता

गोली चलाने से पहले तुम्हारे हाथ तो क्या तुम्हारी रूह भी कांप उठती।
जब कर्ज के बोज तले तुम्हारे घरवालों को फाँसी लगानी पड़ती।।

किया तब भी यह कहे पाते की मै गद्दार हुँ ।
पालता हुँ पुरी दुनिया को फिर भी कर्जदार हुँ ।।

अगर आंखों में आंसू लिये अपने पिता को रस्सी के फन्दों पँर झूलते देखा होता।
पकवानों से सजी प्लेट में किसान के मेहनत के पसीने की सुगंध को देखा होता।।

तो आज तुम्हारी हिम्मत नही होती यू मुझे पर भर बजार गोली चलाने की ।
अब तो किसान कार्ड के झुनझुनों से पक चुका हूँ इसी लिये कसम ली हे दुनिया हिलाने की ।।

सुनो ‘साँवरीया’ उठा के हथियार कह दो मे ही सरकार हुँ ।
पालता हुँ पुरी दुनिया को फिर भी कर्जदार हुँ।।

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