Farmer Suicide : पेट भरते ही इंसान अपनी औकात भूल जाता हैं।

Farmer Suicide ( किसान आत्महत्या )

कचरे में पड़ी रोटियां यहीं बयां करती है,
कि पेट भरते ही इंसान अपनी औकात भूल जाता हैं।
खाली पड़ी थालियां खनखन की आवाज़ से बताती हैं,
कि भूखे पेट में व्यक्ति ईश्वर के भजन करना तक भूल जाता है।।

कुपोषण और भुखमरी उन्हें कहाँ समझ आती है,
जिनका खाना पांच पकवानों की सुगंध से महकता है।
रोटी के ऊपर मिर्च और पानी डालकर खायी जाती है,
क्योंकि जब पकी हुई फसलों कोें सड़कों पर फेंकना पड़ता हैं।।

बैंक और साहूकार को खराब फसल कहाँ नजर आती है,
दिए गए कर्ज और ब्याज के मायाजाल में मानवता भूल जाता है।
खुद्दार किसान की किस्मत की भी अजब कहानी है,
ईश्वर से बच भी गया तो इंसानों के स्वार्थों से कहाँ बच पाता है।।

खून की दलाली के लिए टोलियां भर भरकर आ जाती है,
लेकिन किसान आंदोलन इनके सितारे चमकाने में खो जाता है।
जूमलों से बच भी गये तो गोलियां चला दी जाती है,
खून सरहदों की जगह अपने ही खेतों में बहा दिया जाता है।।

किसान के बेटों के खून से देश और तिरेंगे की लाज बचती है,
बुद्धिजीवी तिरेंगे में लिपटे शहीद की शहादत कहा समझ पाता है।
हल और बंदूक चलाते जिंदगी देशसेवा में निकल जाती है,
‘सड़क के गुंडे’ या ‘डायर’ कहने पर भी मनोबल कहाँ कम होता है।।

मुवावजे और मदद के नाम पर खिल्ली उड़ाई जाती हैं,
अपने राजनैतिक मकसदों के बीच किसान कहां ठहर पाता है।
कभी अहमदनगर तो कभी मंदसौर में फंदे पर जान लटक जाती है,
लाठीचार्ज और गोलियों से हुई बर्बादी का मंजर फैल जाता है।।

पेट भरते ही इंसान अपनी औकात भूल जाता हैं।।

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