ज़िन्दगी ही महाकाव्य बन गया है

ज़िन्दगी ही महाकाव्य बन गया है,
अब क्या लिखे कलम और पेपर में ।
कोयल की आवाज सुनना भूल गया है,
अब वो ताजगी नही है गीतकारों के शब्दों में।।

संघर्ष ही जीवन की किस्मत बन गया है,
अब क्या रखा है हथेलियों की रेखाओं में।
कर्म के पथ पर चलना सीख लिया है,
अब समय नही है किस्मत के बहाने बैठे रहने में।।

तिनकों और पत्तियों से कुनबा कहाँ बन पाया है,
देखी है हौसले की उड़ान परिंदों के साहस और पंखों में ।
गिर कर उठना, फिर गिरना और संभलना आ गया है,
अलग ही मजा है चींटियों के संघर्ष में अपने उद्देश्य को ढूढ़ने में।।

निज पर शासन फिर अनुशासन आ गया है,
सभी का भला हो जाता है नियम पालन करने में।
ऊँचे पहाड़ो और पर्वतों से मजबूत इरादा बन गया है,
सब समझ आ जाता है खुली आँखों से सपने देखने में।।

एक दूसरे का हाथ थामने का समय आ गया है,
आनन्द की अनुभूति होती है मुश्किल घड़ी के सहयोग में ।
अपने जब अपने बन जाते है तो दुख सुख में तब्दील हो गया है,
सब सुख पीछे छूट जाते है एक थाली में खाना खाने के आनन्द में।।

 

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