लघु कथा : मित्रता पर भारी क्रोध 

एक बार चंद्रपुर में राम और श्याम नाम के मित्र रहते थे, दोनों की मित्रता बहुत ही गहरी थी। जब भी प्रेम और विश्वास की बात इस गांव में होती तो उनकी मित्रता की मिसाल दी जाती थी। राम जहां एक सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखता था तो श्याम एक गरीब लेकिन बहुत ही खुद्दार किस्म का व्यक्तित्व रखता था।
श्याम चंद्रपुर का रहवासी शुरू से ही नही था उसके सारे परिवार वाले चंद्रपुर के ही पास वाले गाँव अलीपुर में रहते थे लेकिन मजबूरीवश उसे वो गाँव छोड़ना पड़ा और वो अपना सारा कारोबार एवं जमीन जायदाद छोड़कर चंद्रपुर विस्थापित हो गया था।
श्याम के पास रहने के लिए छत और खाने के लिए भोजन की व्यवस्था करना दूभर हो रहा था क्योंकि नई जगह पर अपने आपको स्थापित करना और पुराने घावों को भूलना बहुत ही मुश्किल होता है। मुसीबत की इस घड़ी में राम ने श्याम की बहुत मदद की जिससे इन दोनों में प्रगाढ़ मित्रता हो गई।
राम ने कभी भी श्याम के अतीत के बारे में ज्यादा विस्तार से बात करने की कोशिश नही की तो श्याम ने भी अपना दुख अपने तक रखने में ही भलाई समझी क्योंकि वो अपने मित्र को परेशान नही करना चाहता था। दोनों की ही ज़िन्दगी अच्छे तरीके से चल रही थी।
दोनों की मित्रता राम के परिवार वालों के साथ ही पूरे गाँव को अच्छी नही लगती थी क्योंकि जब भी राम पर मुसीबत होती तो श्याम वहां खड़ा मिलता । राम का परिवार गाँव के संपन्न परिवारों में गिना जाता था तो श्याम का उनके घर मे आना जाना उनको बहुत अखरता था।
इन दोनों की मित्रता से परेशान हो कर के राम के परिवार वालों ने इस मित्रता को तोड़ने की तरकीब सोची। उन्होंने एक दिन श्याम को बुलाया और कहा कि राम शहर गया हुआ है और वो बहुत मुसीबत में है उसे आज ही 5000 हज़ार रुपए की जरूरत आन पड़ी है। हम तुम्हें 5000 रूपये देते है वो शहर तक पहुंचा दो।
अपने मित्र को परेशान देखकर श्याम एक बार घबरा गया और तुरंत ही पैसे लेकर शहर की तरफ रवाना हो गया, पूरे रास्ते में इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि आखिर राम को क्या हो गया जो इतने सारे पैसों की जरूरत आन पड़ी। वो अपने मित्र को सहायता करने के लिए पवन के वेग से चल रहा था।
वास्तव में राम शहर गया ही नही था ये तो इनकी मित्रता को तोड़ने के लिए युक्ति बनाई गई थी। राम के आते ही उसके घर के सदस्यों ने श्याम के इतिहास के बारे में पूरी झूठी कहानी सुना डाली थी और उसके ऊपर 5000 रुपये की चोरी का भी इल्ज़ाम लगा दिया। राम को यह सुनकर बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ लेकिन श्याम के इतिहास के बारे में उसे भी कुछ पता नही था तो उसने घर वालों की बात को मान लिया। राम अब बहुत ही क्रोधित हो कर श्याम का इंतज़ार कर रहा था।
उधर इस जालसाजी से बिल्कुल अनभिज्ञ श्याम अपने दोस्त की मदद के लिये शहर पहुचने की जल्दी में था। जब गंतव्य तक पहुँचा तो उसे पता चला कि जिसे पैसों की जरूरत थी वो चंद्रपुर का नही बल्कि अलीपुर का रहीम था जो राम का मित्र था। अपने पुराने गाँव के व्यक्ति और राम के मित्र को मुसीबत में देखकर उसने 5000 रुपये उसे दे दिए तथा हालात सामान्य होने पर राम को ही लौटाने के लिए कह दिया।
श्याम मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था कि उसके परम मित्र को कोई मुसीबत नही हैं और वो बिल्कुल सही सलामत है। अब प्रसन्नता के साथ वो चंद्रपुर की तरफ चल पड़ा।
वही राम उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था क्योंकि उसे विश्वास नहीं हुआ कि उसका परम मित्र उसके साथ धोखा कर सकता है। उसको श्याम के साथ बिताए हुए सारे पल आखों के सामने आ रहे थे।
इसी तनातनी के माहौल के बीच मे श्याम भी चंद्रपुर आ पहुंचा। अपने  मित्र को सही सलामत देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और गले लगने के लिये राम की ओर दौड़ पड़ा। जैसे ही श्याम राम के पास पहुचने वाला था तो राम ने क्रोध में उसे दूर धक्का देकर नीचे गिरा दिया। क्रोधित राम आग उगलने लगा और न जाने क्या क्या श्याम के बारे में बोलने लगा। क्रोध में अनायास ही उसने श्याम के ऊपर हाथ भी उठा दिया और उसे घर से निकलने के लिए बाहर खदेड़ दिया।

 

इस अपमान को भी श्याम ज़हर की तरह पी गया और चुपचाप वहां से निकल आया क्योंकि उसे पता चल चुका था कि ये उसका मित्र नही है ये तो क्रोध में बुरा बर्ताव कर रहा था क्योंकि उसे भरोसा था कि परम मित्र राम कभी भी ऐसा व्यवहार नही कर सकता था। राम के घरवालों की यह तरकीब काम कर गई और दोनों मित्रों की मित्रता का अंत हो गया। अब दोनों मित्र एक दूसरे से नजरे चुराने लग गए और कही पर भी एक साथ दिखाई नहीं देते थे।

 

कुछ समय बाद रहीम, राम के पैसे लौटाने के लिये चंद्रपुर आया तो राम के घरवालों ने उसे घर में घुसने ही नही दिया लेकिन जब पैसों की बात आई तो वो राज़ी हो गए लेकिन रहीम ने भी पैसे सिर्फ राम को ही देने की शर्त रख दी।
राम के आने के बाद रहीम ने उसे पैसे देने की कोशिश की तो राम ने पैसे लेने से इनकार कर दिया तो रहीम ने अपनी सारी कहानी राम को बता दी और साथ ही श्याम को भी धन्यवाद दिया। श्याम का नाम सुनते ही राम सकते में आ गया। राम ने भी रहीम से श्याम के इतिहास के बारे में सारी बातें जान ली।
सारी बाते सुनकर राम के क़दमो तले जमीन खिसक गई, वो पश्चाताप की आग में जलने लगा और जितना जल्दी हो सकता था श्याम से मिलना चाहता था। राम दौड़ता हुआ श्याम के घर पहुंच कर उसके पैरों में गिर पड़ा तथा उससे अपने किये गए व्यवहार के लिए क्षमा याचना करने लगा। अपने मित्र को श्याम ने उठाकर गले लगा दिया और दोनों की अश्रुधारा निकल पड़ी।
श्याम ने राम से कहा कि ” यह मानवीय प्रवृत्ति होती हैं कि किसी भी क्रिया पर हम बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। अगर शान्त मन और दिमाग से सोच कर हम जवाब दे तो हम व्यर्थ की मुसीबतों से बच सकते हैं। हमारा दिमाग 70 प्रतिशत ऐसे व्यर्थ के विचारों में लगा रहता है जिन पर हम सोचने के अलावा कुछ भी नही कर सकते है। अगर मैं चाहता तो उस समय तुम्हे सब कुछ बता सकता था लेकिन मुझे पता था कि तुम कुछ नही सुनोगे इसीलिए चुपचाप वहां से निकलने में ही भलाई समझी ।

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