लगता है ऐसे ही चौपालों को हर बार गिरना होगा

एक अजब माहौल बना हुआ है गांव में,

जिस तक पहुंचने में लगा समय घंटो और पहरों में।

साहब को भी आज गड्ढे शायद समझ आये होंगे,

सिंगापुर ट्रिप ही गये थे सड़क बनाने के पैसों में।।

 

ठेकेदारों के बिल अटका कर निगल गए थे डिवाइडर,

आज उन्ही की कमी लग रही थी शायद सफर में,

बेतरतीब गाड़ियों ने बहुत सत्ताया साहब को,

गाड़ियों के टायर भी कर चुके अभिषेक दो चार बार।।

 

थके हारे पहुंच चौपाल पर जहाँ थी टूटी पट्टी निशान की,

उतरे चेले चपाटे और गाँव मे मुनादी करवा दी,

साहब आये है हाल चाल जानने यह बात फैला दी,

चहल पहल मच गई उस बर्बादी के मंजर में भी।।

 

बच्चे अभी भी साहब को आश्चर्यजनक रूप से देख रहे है,

बूढ़े काका भी झुकी कमर से चौपाल की ओर बढ़ रहे है।

मुखिया जी भी पहुंचे अपने नौजवान साथियों के साथ,

अब शुरू होने वाला था मनुष्य जीवन का मोलभाव।।

 

उठे साहब और गरजे कि नही ये उनकी हाथ की बात,

विधाता की लेखनी पर नही चलता किसी का जज्बात।

बर्बादी का मंजर देख चुका हूँ, अब मदद की है जरूरत,

सरकार ने भेजा है दो वक्त का भोजन और रहने को छत।।

 

तभी गिर गया सरकारी पैसों से बना चौपाल ,

बाल बाल बचें साहब और गिर गए ज़मीन पर धड़ाम।

दौड़े चेले बचाने को लेकिन तब तक अक्ल ठिकाने आ गई,

अब साहब के मन मे दम्भ ने था, यही था विधाता का न्याय।।

 

साहब को शान्त देख मुखिया जी के होश उड़े,

हाथ जोड़कर विनती करते हुए हो गए खड़े।

विकास के नाम पर जो विनाश हो चुका था,

साहब को भी अब गलती का एहसास हो चुका था।।

 

गाँव की हालत के जिम्मेदार साहब ही तो थे,

बाढ़ का कारण नए बने नहर और पूल ही तो थे।

खूब मलाईया खाई थी पूरे निर्माण के दौरान,

10 की जगह 2 कट्टे सीमेंट ही तो लगाए थे हर बार।।

 

पहली बारिश में पूल टूटा तो लोगो का सब्र भी,

दूसरी में नहर तो गांव के घर भी ठहर नही सके ।

उस सैलाब में कई घर तो मवेशी बह चुके थे,

नई बनी सड़क भी ऐन वक्त पर धोखा दे चुकी थीं।।

 

अब लीपापोती की बारी साहब के चेले चपाटों की थी,

करने लगे नुकसान का आकलन अपने अंदाजों में।

उन्हें पता था कि मुवावजे से वो बच जाएंगे इस बार भी,

50 हज़ार में माल तो 1 लाख में जान भी खरीद लेंगे ।।

 

लेकिन साहब इस बार कुछ अलग अंदाज में थे,

डांटने लगे चेलों को उनकी काली करतूतों पर।

माफी मांगी मुखिया से और सब सही करने की कसमें ,

किया वादा लौटा नही सकते बर्बाद हुए आंगन को।।

 

इस बार वो भूल नही होगी निर्माण में,

सिंगापुर की जगह आऊंगा रामपुर में छुट्टियां मनाने,

गाँव में फिर आशा की किरण का बिगुल बजा,

उस चौपाल ने भी ढह कर अपना काम कर दिया।।

 

खुशी की लहर फैल गई उस बर्बादी के वीराने में,

आज एक साहब की आंख खुल गयी दिन के उजाले में।

लगता है ऐसे ही चौपालों को हर बार गिरना होगा,

तभी शायद इस देश के साहबों को आत्मज्ञान होगा।।

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