हवा में उड़ने वालों को ज़िंदा रहते ज़मीन कहाँ नसीब होती है ।

चारों तरफ पानी का सैलाब है,

आम आदमी इन्द्रदेव के कहर का शिकार है।

कही घर बहते है तो कही सपने उजड़ते है,

पर इंसान के लिए मुसीबते कहाँ कम हो पाती हैं।।

     
कच्चे घर इस कहर को कहाँ सह पाते है,

मजबूत इरादे भी कब तक खड़े रह पाते है।

उड़ते छप्पर और टूटती दीवारों का सिलसिला है,

बिन छत के घरों की भी अपनी अलग कहानी हैं।।

     
टूटी फूटी सड़के बदहाली का गान गा रही है,

मिट्टी से बने नालें कब तक पानी के बहाव रोक पाते है।

सड़को का बजट हुक्मरानों के घर सजाने में काम आता है,

गरीबों का जीवन तो सिर्फ एक खबर बन कर रह जाता है।।

    
हुक्मरानों ने भी हवाई सर्वेक्षण कर दिए है,

मदद के नाम पर दो खाने के पैकेट भी गिरा दिए है।

कुछ राजनीतिक रोटियां सेंकने भी पहुंच चुके है,

हर दूसरे हप्ते विदेश जाने वाले भी मिलने आ गए है।।

   
किसी को मलबे में दबी लाश नही दिखती है,

धराशायी हो चुके घर की कीमत समझ नहीं आती हैं।

मदद के नाम पर ठेंगा दिखा कर बचा जा सकता हैं,

हवा में उड़ने वालों को ज़िंदा रहते ज़मीन कहाँ नसीब होती है।।

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