भूखें पेट नींद कहाँ आती हैं

भूखें पेट नींद कहाँ आती हैं…

लाखों – करोड़ों के घोटाले के बाद,
कुम्भकर्ण की चैन की नींद कहा कम हो पाती हैं।
पशुओं के हक़ का चारा खाने के बाद रोटी किसे भाती हैं,
बिन चारे मरती गायों और बछड़ों के ग़्वालो से पूछो,
भूखें पेट नींद पशुओं को भी कहाँ आती हैं ।।

 

बाढ़ और भारी बारिश के बाद,
झोंपड़ियाँ क़हर के सामने कहाँ टिक पाती हैं।
तटबंधो के पैसों से पाँच सितारा में पार्टियाँ होती हैं,
ख़ाली डिब्बों की खनखन के बाद बेबस माँ से पूछो,
प्रकृति के क़हर से कब ज़िंदगी उबर पाती हैं।।

 

अकाल से फ़सले बर्बाद होने के बाद,
बैंक और साहूकारों के सामने जान कहा बच पाती हैं।
क़र्ज़ के बौझ तले रस्सी के फंदे पर फाँसी ही नज़र आती हैं,
परिवार के उजड़ जाने के बाद बेबस पथराई आँखो से पूछो,
बूढ़े कंधो की ज़िम्मेदारी कैसे उठाई जाती हैं ।।

 

समाज में इज़्ज़त नीलाम होने के बाद ,
समाज के ठेकेदारों के सामने सत्य की जीत कहाँ हो पाती है।
झूठी आन और बान के चक्कर में नन्ही सी जान पर आ बनती हैं,
गर्भ में ही जन्म से पहलें मर जाने वाली बेटी से पूछो,
बेटी की क़ीमत कब समझ आती हैं।।

 

घर के चिराग़ को अपनी गोद में खोने के बाद,
सिस्टम की लापरवाही के सामने जान कब बच पाती हैं।
अपनी जेबें भरने के चक्कर में ऑक्सिजन भी हवा हो जाती हैं,
दुनिया के भारी होते छोटे – छोटे कफ़न से पूछों,
ग़म को भूलने में कितनी मुश्किल आती हैं।।

 

अपनी अय्याशी में जान गवाने के बाद ,
सूपर बाइक पर प्रतिबंध से बात कहाँ बन पाती हैं।
नियमों को ताक में रखने को ही समझदारी मानी जाती हैं,
कुछ पलों में जान गवाने वालों से पूछो,
एक रेड लाइट कूदने में क्या खो जाती हैं ।।

 

अपनी सोच दूसरों पर थोपने के बाद,
धर्म या जाति के नाम पर भगदड़ मचाई जाती हैं।।
संविधान को ताक में रख कर मनमर्ज़ी की जाती हैं,
बेगुनाहों के ख़ून से खेलने वालों से पूछो,
तलवार या बंदूक़ शक्ल कब याद रख पाती हैं।।

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