इंजीनियरिंग की कहानी, इंजीनियर की जुबानी 

प्रथम वर्ष

IIT और AIEEE के सदमे के मारे,

हो जाते हैं अनजान यूनिवर्सिटी के हवाले,

हर किसी के दिल मे होता हैं रैगिंग का डर,

समझ मे नही आता कैसे बच जाए सीनयर से कल,

पकड़ें जातें हैं कहीं भी तो हो जाता है दिमाग़ ख़राब,

जब सीनयर बोलता हैं जूनियर से अबे जूनियर नाइंटी मार।

दिन गुज़रते है फ़्रेशर पार्टी आती हैं,

साथ में रेग्गिंग का डर उड़ा ले जाती हैं,

हर दिल में होती है टॉपर बनने की हसरत,

किताबों से मिलती नहीं किसी को भी फ़ुरसत,

एक एक नम्बर के लिए मरते हैं हम सब,

सब पर करते हैं 70 की सरहद ।

 

द्वितीय वर्ष 



सीनयर बनने का होता है हमको अभिमान,

सब जूनियर हो जातें हैं हमसे सावधान,

दोस्त बँट जातें हैं कई अलग अलग ग्रूप्स में,

हर कोई दिखता हैं नए नए लुक्स में,

पढ़ाई में तो दिल नहीं लगता किसी का,

हर कोई ढूँढता हैं मौक़ा परपोज करने को किसी का ।

 

पूरी रात हम सब बातों में बिताते है,

सुबह उठने के चक्कर में कॉलेज को गरियाते हैं,

हर किसी को यही लगता हैं कि उसको प्यार हो गया हैं,

उफ़्फ़ अब तो जीना भी दूभर हो गया हैं,

कुछ इसी कश्मकश में सफल हो जाते है तो ,

दोस्तों में ज्ञान बाँटते है तो कुछ ट्रिक्स भी,

इज़्ज़त इतनी मिलती हैं कि ,

जिसको देख मुस्कराहने लगते है सभी,

होश जब ठिकाने आता है तो ख़ूब चिलाते हैं,

अरे यार अब 60 लाना भी है मुश्किल,

पुराने 5 साल के साल्व्ड पेपर ही सब आज़माते हैं ।

 

तृतीय वर्ष 

 

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तीसरा साल आते ही अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास दिलातीं हैं,

क्योंकि अगले साल प्लेसमेंट की टेन्शन सताती हैं,

पर जब भी कमबख़्त पढ़ने को बेठते है तो ,

एक बार उसकी याद ज़रूर सताती हैं,

नई नई टेक्नॉलजी सीखने का जोश आता हैं,

कोई जावा तो कोई डॉट नेट के चक्कर में,

कोई मैट लैब या CNC में केरियर बनाने के ख़्वाब सजाता हैं ।

 

अटेंडन्स और डिटेन लिस्ट आती हैं

तो अब संख्या कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती हैं,

इंटर्नल और प्रैक्टिकल में मार्क्स कैसे लाए जाते हैं,

ये अब कुछ ज़्यादा ही समझ आ जाता हैं,

डेस्क और प्रॉक्सी का आप्शन जो मिल जाता हैं,

मेहनत सबकी रंग लाती हैं,

पढ़ाई की गाड़ी अब वापस ट्रैक पर आ जाती हैं

 

चतुर्थ वर्ष

फ़ाइनल ईयर आता हैं तो दोस्तों में फ़ासले बढ़ाता हैं

हर कोई चेहरा अब टेन्शन में डूबा नज़र आता हैं

क्योंकि क्या क्या करे ये समझ ही नहीं आता हैं

दिल आगे की सोच कर बहुत ही घबराता हैं

हर दिन सेकंड की तरह बहुत जल्दी गुज़र जाता हैं

दिल में बस डर ही रह जाता हैं

हर कोई ऊपर वाले को याद करता हैं

बस मुझे एक अदद नौकरी दिलवादे

पूरे दिन ये हर वक़्त फ़रियाद करता हैं

टेन्शन बढ़ती जाती हैं जब इंटरव्यू का वक़्त आता हैं

‘ Tell me about yourself ‘ में क्या बोलें,

उसके लिए कन्फ़्यूज़न बढ़ता जाता हैं

दिल की धड़कने तेज़ हो जाती है जब रिज़ल्ट आता हैं

पर किसी दोस्त का ना हो तो

दिल रोए या हँसे ये समझ में नहीं आता हैं

अनप्लेसड दोस्त अक्सर नज़रें चुराते हैं

और दिल को हर बार घायल कर जातें हैं

कुछ दिन फ़ाइनल समेस्टर देने के बाद

हर कोई अपने रास्ते निकल जाता हैं

शायद यहीं ज़िंदगी है एक अनजान सफ़र

वक़्त चुपके से हमसे यही कह जाता हैं

दिल में एक कसक होती हैं

जब हर आँख नम होती हैं

फिर एक दूसरे से मिलने के वादे के संग

सभी का साहस बढ़ाते हैं

कभी ना अकेले रहने वाले दोस्त

बस यादों के सहारे ज़िंदगी बीताते हैं

लेकिन जब भी यह कॉलेज के दिन याद आते हैं

होठों पर हँसी और आँखों में आँसू आ जातें हैं

One thought on “इंजीनियरिंग की कहानी, इंजीनियर की जुबानी 

  • August 29, 2017 at 1:41 am
    Permalink

    Well explained…I can feel the same as I did engineering,

    Reply

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