अन्धभक्ति और श्रद्धा में क्यों उमड़ें लाखों हज़ार

अन्धभक्ति और श्रद्धा में क्यों उमड़ें लाखों हज़ार
शायद उनकी इंसानियत खो गयी थी इस बार ।
दोषी तो चला गया अपने कर्मों से जेल के उस पार
लोगों ने आग लगा दी बचाने को इनके घर-बार ।।

 

ये समझ नहीं आता कैसी श्रद्धा और भक्ति हैं
जिसमें हर बार मासूमों की हत्या ही नियति हैं ।
भड़काने पर भावनाएँ कैसे आहत हो जाती हैं
आग और हिंसा से ही हर बार शांति हो पाती हैं ।।

 

कैसे हम उनको अपना भगवान बना लेते हैं
जो काम और वासना में ही डूबें पायें जातें हैं ।
क्यों उनके दरबारों में हर बार बेबस नज़र आते हैं
जो साधना के नाम पर मलाइयाँ चटकारते हैं ।।

 

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जब साधना कक्षों की दीवारें भी बोल उठती हैं
उससे बड़े बड़ें साम्राज्यों की चूलें हिल जाती हैं ।
काली करतूतों का नंगा नाच दिखला पाती हैं
पापों से कर्म रूपी घड़े की मिट्टी दरक जाती हैं ।।

 

क्या हमारी बुद्धि भी अब राह भटकने लगी हैं
कब एक समोसे और चटनी से नौकरी लगी हैं ।
हर बार इनके पापों को क्यों छुपाया जाता हैं
मासूमों के सहारे शिकंजे से बचाया जाता हैं ।।

 

जो श्रद्धा के नाम से बेटियों से क्यों खिलवाड़ करें
भक्ति के नाम पर गाड़ियों को आग के हवाले करें ।
जो ख़ुद खड़ा कटघरे में हाथ जोड़कर मिन्नते करें
अपना काम निकालने के लिए मौत का ताण्डव करें ।।

 

क्यों लग जाते हैं हर बार लोगों की बुद्धिमता पर ताले
जो अपने स्वार्थ और पापों के लिए आग लगा डालें ।
जिनके कर्म भी समय-समय पर सिद्ध होते है काले
जान और माल के प्यासे बन जातें है इनके रखवाले ।।

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