मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ

मृत्युभोज के बोझ तले घर-परिवार बिखरें,
समाज की प्रतिष्ठा में क़र्ज़ की खिंचतीं लकीरें।
इन गिद्दो की तरह मँडराते भक्षकों का पेट कैसे भरूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

लेन-देन ने डाल रखी है बेटियों के पाँवो में ज़ंजीरे,
अपने भाई का घर बाँधने में मासूम ले लेतीं है फेरें ।
पिया घर में सौतन न लाये ये कैसे विश्वास करूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

युवाँ छोड़ पढ़ाई बनते जातें राजनैतिक दलों के मोहरें ,
गुण्डई और दादागिरी के अनगिनत मिल जातें ज़ख़ीरे ।
इस बेरोज़गारी के मंज़र में कैसे रोज़गार का जुगाड़ करूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

 

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सम्मान के नाम पर पीने में मदमस्त है ज़हर के कटोरे,
महेंगे नशों के चक्कर में महाजन पुश्तेनी ज़मीन डकारें।
अभावों में रोते बिलखते बच्चों को कैसे चुप करूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

स्वार्थवश बनाकर अपने संगठनों से रोज़ पिटते है ढिंढोरे,
वर्चस्व की दौड़ में कोई नहीं है यहाँ जो समाज सुधारें ।
पैसों की अन्धी दौड़ में नेतृत्व की अपेक्षा क़िससें करूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

अशिक्षा और ग़रीबी में कटती जाती जीवन की डोरे,
अकाल और आलस्य से टूटती झोंपड़ियों में भूख पुकारें ।
अन्नदाता ही क़र्ज़ से परेशान तो अब क़िससे उम्मीद करूँ,
मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ ।।

3 thoughts on “मनु का वंशज होने का कैसे अभिमान करूँ

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