गाँधी जयंती विशेष : आज शर्मिन्दा हूँ

आज शर्मिन्दा हूँ,
समाज़ पर स्वार्थ को हावी होता देखकर,
सत्य को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से हारता देखकर
समझदारी को कटुता के तले रोंदता देखकर
संयम को बेहया से लज्जित होता देखकर
सम्पूर्णता को मूल्यों से ख़ाली होता देखकर

आज शर्मिन्दा हूँ,
प्रेम पर कटुता को भारी होता देखकर
प्रेरणा पर अज्ञान को हावी होता देखकर
प्रतिज्ञा को झूठ के पुलिंदो से हारता देखकर
प्रायश्चित को घमण्ड से लड़ता देखकर
प्रतिष्ठा पर ज़िन्दगीयाँ क़ुर्बान होता देखकर

आज शर्मिन्दा हूँ,
अपनो को अपनों से लड़ता देखकर
अज्ञान को ज्ञान से हारता देखकर
अंधविश्वास को मानवता से बड़ा होता देखकर
अन्याय को न्याय से जीतता देखकर
अनीति को नीति से झूझता देखकर

आज शर्मिन्दा हूँ,
रूढ़िवादिता की बेड़ियों में झकड़ता देखकर,
रूपयों से रूह को ख़रीदता देखकर
रुकावटों से हर बार दूर भागता देखकर
रूप के चक्कर में सोंदर्य खोता देखकर
रुतबे को परम लक्ष्य बनता देखकर
 
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आज शर्मिन्दा हूँ,
ज़मीन के टुकड़ों पर लकीरें खींचता देखकर
जिहाद के नाम पर आंतक फैलता देखकर
ज़मीर से इंसानियत को हारता देखकर
ज़िन्दादिली पर डर का आवरण चढ़ता देखकर
जोश पर आलस्य पर हावी होता देखकर

आज शर्मिन्दा हूँ,
भावनाओं पर मतों को हावी होता देखकर,
भाषा की मर्यादाओं को तार-तार होता देखकर,
भय को सुरक्षा का मज़ाक़ बनाते देखकर,
भविष्य को वर्तमान में उड़ता देखकर,
भाईचारे को अफ़वाहों की भेंट चढ़ते देखकर

आज शर्मिन्दा हूँ,
बेरोज़गारों की बढ़ती भीड़ को देखकर
बाज़ार को बेईमानी की राह पर चलते देखकर
बर्बादी के मंज़र पर चलती दुनियाँ को देखकर
बेहिसाब सम्पति जमा करते इंसानों को देखकर
बेपरवाह होती नौजवान पीढ़ी को देखकर



 

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